Saturday, 13 July 2013

हत्यारों का कोई मज़हब नहीं होता, कोई ईमान नहीं होता !


हर हिंदू हिंदुत्ववादी नहीं होता, इसलिए उसे वैसा नहीं माना जा सकता. कोई हिंदू कितना भी बड़ा अहंकारी क्यों न हो, उसे यह ह्क़ नहीं बनता कि वह देश के तमाम हिंदुओं की ओर से बोल सके. बडबोले कठमुल्ले (हिंदू हों या मुसलमान) एक तरह की संकीर्णता से ग्रस्त होने के कारण एक-दूसरे को प्रासंगिक बनाए रखते हैं. पर ध्यान देने की बात यह है कि दोनों ही तरफ़ ऐसे लोगों की संख्या कहीं अधिक है जो मनुष्य-विरोधी कट्टरता के खिलाफ़ हैं, पूरी तरह से.

हिंदू-उदारता की दुहाई देने वालों को इस पर गौर करना चाहिए. छह महीने तक चला लो अपनी बदज़ुबानी, दिखा लो अपनी बदगुमानी, पर उसके बाद? यह समाज तो फिर भी चलता रहेगा, पर तुम्हारा क्या होगा, कालिया?

यह देश खल शक्तियों को नायक नहीं बना सकता. कभी नहीं. यह लिखा हुआ है, दीवार पर ! जो नहीं पढ़ना चाहते हैं इसे, नुक़सान उनका ही है. हर हाल में होगा भी.


मैं किसी भी तरह के, किसी भी तरफ़ के हत्यारे के न सिर्फ़ साथ नहीं हूं, बल्कि उसका खुला विरोधी हूं, चाहे जन्मना हिंदू हूं बेशक !

हत्यारों का कोई मज़हब नहीं होता, कोई ईमान नहीं होता ! वे संग-दिल होते हैं, इसलिए माफ़ी मांगने तक की तमीज़ नहीं होती उनमें. वे मुंह खोलते हैं, तो सड़ांध फैलने लगती है. प्रकृति ने कुछ जीव ऐसे भी बनाए हैं जो सड़ांध तक से आकृष्ट होते हैं. पर वे इंसान नहीं होते !

-मोहन श्रोत्रिय

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