Wednesday, 25 April 2012

साहिल के तमाशाई

कल सुबह मीना कुमारी का एक शेर स्टेटस में दिया था.    साहिल के तमाशाई, हर डूबने वाले पर
अफ़सोस तो करते हैं, इमदाद नहीं करते.

एक मित्र को लगा इस पर आलेख-जैसा कुछ हो तो बात और खुले. मैंने वादा तो किया था एक पूरे आलेख का लेकिन  दिन में कुछ अन्य न टाले जा सकने वाले कामों को पूरा करने के चक्कर में इतने से ही मन को तसल्ली देनी पड़ी. टिप्पणियां देखते हुए मिलती-जुलती ज़मीन पर उनका ही एक शेर और साझा किया.
दिन डूबे है या डूबे बारात लिए क़श्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता.

लिखते-लिखते यकायक कौंधा कि दुष्यंत कुमार ने भी एकदम इसी भाव-भूमि पर एक शेर कहा था, जिसने एक ज़माने में बेहद लोकप्रियता हासिल कर ली थी. कह सकते हैं, अनेक लोगों की ज़बान पर चढ़ गया था, यह शेर.
वो कोई बारात हो या वारदात अब
किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां.

इन तीनों शेरों की जो भाव-भूमि है, वह लोगों की उदासीनता और तटस्थता पर चोट करती है. "क्या फ़र्क़ पड़ता है के भाव पर!" यानि जो 'रोज़ घटित होने वाली बातें हैं, उन पर कितना/क्या स्यापा किया जाए.' लोहार वाली चोट तो नहीं कहा जा सकता इन्हें, सुनार वाली चोट कह लीजिए. दोनों शायरों की जो अंतर्निहिहित दृष्टि है, वह व्यंग्य के बहुत क़रीब है. लोगों की बढ़ती चेतना-शून्यता पर. अचानक दुष्यंत कुमार का ही एक और शेर याद आया जो आज पहले कभी से ज़्यादा प्रासंगिक लगता है.
लहू-लुहान नज़ारों की बात आई तो,
शरीफ़ लोग उठे, दूर जाके बैठ गए.
कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां इशारा न केवल वास्तविक जीवन की घटनाओं के प्रति उदासीनता की ओर है बल्कि उस दुविधा और भयग्रस्त मानसिकता की ओर भी है जो लोगों को किसी भी तरह के संभावित संकट की ज़द में आ जाने से अपनेआपको बचाने की उत्कट इच्छा की ओर भी है.
यह सब सोच ही रहा था कि एक मित्र ने याद दिलाया कि आज दिनकर जी की पुण्यतिथि है. दिनकर जी, जिन्होंने तटस्थता पर सबसे घनघोर प्रहार किया था.
...जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध. दिनकर जी की उत्कृष्ट सामाजिक सचेतनता का ही नहीं अपितु स्पष्ट एवं मुखर सामाजिक पक्षधरता का भी साक्ष्य मिलता है इस पंक्ति में. प्रसंगवश, वह जनता के साथ थे, यह तो उनकी बहु-उद्धृत पंक्ति (जिसने नारे का रूप भी ग्रहण कर लिया था) : सिंहासन खाली करो कि जनता आती है  से भी साफ़ ही है.
तटस्थता ढोंग है. दिखावा है. आत्म-प्रवंचना है, कायरता है. हम जब तटस्थ दिखने का उपक्रम कर रहे होते हैं, उस समय भी मन ही मन एक पक्ष ले रहे होते हैं. पक्षधरता को उजागर करना जोखिम भरा काम लगता है, तो लोग तटस्थ होने का भरम फैलाते हैं. कोई भी व्यक्ति 'पिटने वाले' और 'पीटने वाले' के प्रति सम भाव नहीं रख सकता. उसकी मनुष्यता का लोप ही हो गया हो तो बात अलग है. वैसे भी, मैं इस कोटि के लोगों के बारे में बात नहीं कर रहा. आज जैसी स्थितियां-परिस्थितियां बनती दिख रही हैं, इनके आलोक में एक चीज़ दिन की तरह उजागर है कि जो लोग भी समतामूलक समाज की स्थापना के स्वप्न को अभी भी प्रासंगिक मानते हैं, जो कॉरपोरेटी लूट के निहितार्थों और फलितार्थों को समझते हैं, जो जात-मजहब के खतरनाक खेल की हक़ीक़त को समझते हैं, उन्हें घोषित रूप से पक्ष तो लेना ही पड़ेगा. अमरीकी साम्राज्यवाद निकृष्टतम राजनीति करते हुए भी दुनियाभर में 'अराजनैतिक होने' को एक 'वरेण्य मूल्य' के रूप में प्रस्तावित-प्रचारित करता रहता है, इस हक़ीक़त की गहराई में जाकर ग़लत राजनीति के खिलाफ़ और सही राजनीति के पक्ष में खड़ा होना होगा. दुविधाग्रस्त मन दुश्मन के काम को आसान बना देता है. ब्रेख्त की इस मुतल्लिक कविता फ़ेसबुक पर ही रोज़ दिख जाती है. मुक्तिबोध जब बशर्ते तय करो किस ओर हो तुम  का आह्वान करते हैं, या पूछते हैं तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है, पार्टनर? तो वह सबसे ज़रूरी सवालों को सीधे समझ में आ जाने वाली भाषा में रखते हैं, ताकि दुरूहता/दुर्बोधता का आरोप न लगे उन पर.
समय आ गया है कि साहिल पर खड़े लोग सिर्फ़ अफ़सोस न करें, इमदाद भी करें ; क़श्ती डूबे तो साहिल पर खड़े लोगों के बीच कोहराम भी मचे ; वारदात हो या बारात निकले तो घरों की खिड़कियां खुलने लगें. 
लहू-लुहान नज़ारों की बात आए तो न केवल समूची वास्तविकता को जानने-समझने से नज़रें न चुराएं. कुल मिलाकर यह कि हमारे चारों ओर जो भी घटित हो रहा है, उसमें हमारा रचनात्मक हस्तक्षेप हमारे सरोकारों, हमारी चिंताओं और हमारी पक्षधरता का साक्ष्य प्रस्तुत करे. बेलाग और बेलौस तरीक़े से. 

2 comments:

  1. आपने तो सही झकझोरा है लोगों को परंतु निजी स्वार्थों से ऊपर उठें तभी वे इसका अनुपालन कर सकेंगे।

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  2. आज ही हिंदुस्तान अखवार में आपके इस पोस्ट को पढ़ा, वहाँ तो पढ़ा ही फिर भी आपके ब्लॉग को पढ़ने का लोभ था ......... सच कहा आपने चेतना शून्यताओं ने समाज को कितना ह्रदयहीन बना दिया है ......

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