Sunday, 30 June 2013

गद्य-पद्य

-महावीरप्रसाद द्विवेदी 


कविता-प्रणाली के बिगड़ जाने पर यदि कोई नए तरह की स्वाभाविक कविता करने लगता है तो लोग उसकी निंदा करते हैं. कुछ नासमझ और नादान आदमी कहते हैं, यह बड़ी भद्दी कविता है. कुछ कहते हैं यह कविता ही नहीं. कुछ कहते हैं कि यह कविता तो ‘छंदोदिवाकर’ में दिए गए लक्षणों से च्युत है; अतएव यह निर्दोष नहीं..बात यह है कि जिसे अब तक कविता कहते आए हैं, वही उनकी समझ में कविता है और सब कोरी कांव-कांव ! 


इसी तरह की नुक़ताचीनी से तंग आकर अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ ने अपनी कविता को संबोधन करके उसकी सांत्वना की है. वह कहता है, “कविते !यह बेक़दरी का ज़माना है. लोगों के चित्त को तेरी तरफ़ खींचना तो दूर रहा, उलटी सब कहीं तेरी निंदा होती है. तेरी बदौलत सभा-समाजों और जलसों में मुझे लज्जित होना पड़ता है. पर जब मैं अकेला रहता हूं, तब तुझ पर मैं घमंड करता हूं. याद रख तेरी उत्पत्ति स्वाभाविक है. जो लोग अपने प्राकृतिक बल पर भरोसा रखते हैं, वे निर्धन होकर भी आनंद से रह सकते हैं. पर अप्राकृतिक बल पर किया गया गर्व कुछ दिन बाद ज़रूर चूर्ण हो जाता है.”

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आजकल लोगों ने कविता और पद्य को एक ही चीज़ समझ रखा है. यह भ्रम है. कविता और पद्य में वही भेद है जो अंग्रेज़ी की पोएट्री (Poetry) और वर्स (Verse) में है. किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है और नियमानुसार तुली हुई सतरों का नाम पद्य है. जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है. गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है. तुकबंदी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं. संस्कृत का प्रायः सारा पद्य समूह बिना तुकबंदी का है और संस्कृत से बढ़कर कविता शायद ही किसी और भाषा में हो. अरब में भी सैकड़ों अच्छे-अच्छे कवि हो गए हैं. वहां भी शुरू-शुरू में तुकबंदी का बिलकुल खयाल नहीं था.अंग्रेज़ी में भी बेतुकी कविता होती है. हां, एक ज़रूरी बात है कि वज़न और काफ़िये से कविता चित्ताकर्षक हो जाती है. पर कविता के लिए ये बातें ऐसी ही हैं जैसे शरीर के लिए वस्त्राभरण. यदि कविता का प्रधान धर्म, मनोरंजकता और प्रभावोत्पादकता उनमें न हो तो इनका होना निष्फल समझना चाहिए. पद्य के लिए काफ़िये वगैरह की ज़रूरत है, कविता के लिए नहीं. कविता के लिए तो ये बातें उलटी हानिकारक हैं. तुले हुए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्रास आदि ढूंढने से कवियों के विचार-स्वातंत्र्य में बड़ी बाधा आती है. पद्य के नियम कवि के लिए एक तरह की बेड़ियां हैं. उनसे जकड़ जाने से कवियों को अपने स्वाभाविक उड़ान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. कवि का काम है कि वह अपने मनोभावों को स्वाधीनतापूर्वक प्रकट करे. पर काफ़िया और वज़न उसकी स्वाधीनता में विघ्न डालते हैं. काफ़िये और वज़न को पहले ढूंढकर कवि को अपने मनोभाव तदनुकूल गढ़ने पड़ते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि प्रधान बात अप्रधानता को प्राप्त हो जाती है और एक बहुत ही गौण बात प्रधानता के आसन पर जा बैठती है. इससे कवि अपने भाव स्वतंत्रतापूर्वक नहीं प्रकट कर सकता. फल यह होता है कि कवि की कविता का असर कम हो जाता है. कभी-कभी तो वह बिलकुल ही जाता रहता है. अब आप ही कहिए कि जो वज़न और काफ़िया कविता के लक्षण का को अंश नहीं उन्हें ही प्रधानता ऐना भारी भूल है या नहीं?

('महावीरप्रसाद द्विवेदी रचना संचयन' से साभार. संपादन : भारत यायावर)



Wednesday, 26 June 2013

ऐसा दो बार हुआ है, मेरे साथ


मैं अपना लिखा कहीं भी नहीं भेजता, छपने के लिए. आप कह सकते हैं कि मुझे भरोसा ही नहीं होता होगा कि मेरा लिखा-भेजा कहीं छप भी सकता है. कोई मित्र मंगा या लिखवा लेते हैं, तो भेज देता हूं. उन मित्रों की कृपा ही कहूंगा कि वे बिना किसी कतर-ब्योंत के उसे छाप भी देते ही हैं. यह कहना इसलिए ज़रूरी लगा कि अपने आपको महावीर प्रसाद द्विवेदी समझने वाले एक-दो संपादकों के बारे में तो यही सुनने को मिलता रहता है कि वे (उनके पास छपने के लिए भेजे गए) दूसरों के लिखे हुए को पढ़ने से पहले ही काट-छांट करने के अपने इरादे को अधिकार के रूप में रेखांकित कर देते हैं. यह अलग बात है कि ऐसे संपादकों के अख़बारों ने मेरे ब्लॉग "सोची-समझी" से मुझे बताये बगैर मेरी ब्लॉग प्रविष्टियों को अविकल रूप से छापा है, कम-से-कम आधा दर्ज़न बार. ये दोनों अखबार मेरे पास आते नहीं. भला हो मित्रों का जो पढ़कर सूचना तो दे देते थे.
हां, यह “दो बार” की बात तो रही ही जा रही है. नॉएडा में रहते हैं एक फ़ेसबुक मित्र, राजेंद्र शर्मा. 2013 के पुस्तक मेले से पहले, उनका संदेश आया कि वह विश्वविख्यात चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसेन पर लिखी कविताओं का एक संकलन संपादित कर रहे हैं. मेरे पास कोई कविता हो, तो भेज दूं. मैंने एक कविता उन्हें भेज दी. उनका तुरंत मेल आया कि कविता उन्हें खूब पसंद आई है, और वह इसे संकलन में शामिल कर रहे हैं.
कुछ समय बाद, यानि मेला संपन्न हो जाने के बाद, मेरी कई मेल्स के उत्तर में, उन्होंने इतना भर बताया कि संकलन शीघ्र ही छप जाएगा. तब से अब तक क़रीब सोलह महीने बीत गए. अब वह मेल का भी जवाब देना मुनासिब नहीं समझते. मैंने इस कविता को फ़ेसबुक के ड्राफ़्ट-बॉक्स में सुरक्षित कर रखा था. पिछले साल मेरा अकाउंट हैक हो जाने के साथ ही वहां सुरक्षित सारी सामग्री लुप्त हो गई. आज सुबह, मुझे अचानक खयाल आया कि मैंने कविता उन्हें मेल की थी, तो इसे “सेंट मेल” में तो होना ही चाहिए. मेल बॉक्स खंगाला, तो कविता मुझे मिल गई. खुशी हुई कि अब बार-बार उनको संदेश भेजकर निराश होने, और होते चले जाने से बच गया!
दूसरा वाकया फ़ेसबुक मित्र "रहे" राकेश श्रीमाल से जुड़ा है. उन्हीं दिनों उनका भी एक मेल आया कि वह साहित्यिकों द्वारा साहित्येतर विषयों पर लिखे डायरी-अंशों का संकलन निकाल रहे हैं. पुस्तक मेला शुरू होने से पहले ही आ जाएगा. मैंने उन्हें अलग-अलग मुद्दों से जुड़ी डायरी-प्रविष्टियां भेज दीं. कहना होगा कि उन्हें भी मेरा लिखा पसंद आया, और प्रस्तावित संकलन के स्तर के अनुरूप लगा. मुझे आज तक पता नहीं कि वह संकलन अभी तक भी छपा है या नहीं. मेरे किसी भी संदेश का जवाब देना उन्हें भी मुनासिब नहीं लगा. संकलन छप गया हो, और फिर भी मुझे न बताया गया हो, तब तो और भी बुरा !
समझ नहीं आता कि एक लाइन का जवाब देने में इतना ज़ोर क्यों आता है मित्रों को !
-मोहन श्रोत्रिय

कुछ इधर की, कुछ उधर की


आपदा-दोहन


 साधु-वेश में कैसे-कैसे लोग घूम रहे हैं, यह केदारनाथ-आपदा ने और अधिक उजागर कर दिया है ! ठग, लुटेरे, और (कदाचित) हत्यारे भी !
कल्पना कीजिए, सवा करोड़ से अधिक की नक़दी और गहने मिले हैं, उनके पास. यह सब देवभूमि केदारनाथ के आसपास !
हिंदुत्व के ये नगाड़ची और कीर्तनिये कैसी धर्म-ध्वजा फहरा रहे हैं, यह देख-सुन-पढ़कर हम सभी भारतीयों के सिर शर्म से झुके जा रहे हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं मानी जानी चाहिए. इसे पढ़कर तो किसी तरफ़ से यह आवाज़ नहीं आएगी, ऐसी उम्मीद है, कि सभी भारतीयों की ओर से बोलने की अनाधिकार चेष्टा है यह ! कि किसने अधिकृत किया मुझे सभी के "सिरों" के बारे में ऐसा बयान देने के लिए ! अब देखिए, सिर तो सिर हैं, शर्मिंदगी की बात पर तो झुकेंगे ही !
यह कोई छोटी बात नहीं है कि कम-से-कम एक मुद्दे पर तो हम सब एक हैं, और समवेत स्वर में इन साधुओं की भर्त्सना करते हैं.
कल देहरादून-स्थित प्रखर युवा पत्रकार सुनीता भास्कर ने एक महिला यात्री के साथ हुई बातचीत के आधार पर जो पोस्ट डाली थी, वह भी रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. जीवित बच निकले यात्रियों और सैलानियों के तमाम तरह के कुकर्मों का आंखों-देखा हाल था वह, उस महिला यात्री के हवाले से. सुनीता ने न केवल उस महिला का नाम दिया था, फ़ोन नंबर भी दिया था.

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ज्योतिषीय सन्नाटा

देश में ज्योतिषियों की भरमार है. दो-चार की ख्याति तो, जैसा ज्योतिष-प्रेमी बतलाते हैं, दुनियाभर में फैली है. इतने सारे ज्योतिषियों में से एक ने भी भविष्यवाणी क्यों नहीं की इस तबाही की? जबकि यात्रा (आस्था-प्रेरित अतवा पर्यटन-प्रेम-प्रेरित) पर जाने वालों में से बहुत से तो ज्योतिषियों से सलाह भी करके गए ही होंगे.
फ़ेसबुक पर भी न जाने कितने ज्योतिषी सक्रिय हैं ! कोई तो बोलता !
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क्रिकेट खिलाड़ियों को एक-एक करोड़ रुपया, पुरस्कार-स्वरूप


यह सब इसी देश में संभव है. दुनिया भर में कहीं भी क्रिकेट खिलाड़ियों पर ऐसी धन-वर्षा नहीं होती. सेना के जो जवान अपनी जान जोखिम में डाल कर निस्स्वार्थ सेवा कर रहे हैं, उन्हें ढंग से यश भी नहीं मिल रहा, धन की तो बात ही बहुत दूर की है. एक 'फ़िक्सर' (मनोज प्रभाकर) एक्सपर्ट राय दे रहा है, एक चैनल पर, और एक दूसरा 'फ़िक्सर' (श्रीशांत) बयान दे रहा है, "मैं अवश्य वापसी करूंगा" ! यह भी इसी देश में संभव है !
आज मीडिया "सबसे बड़े सेनापति" के रूप में धोनी को दिखा रहा है.
असल सैनिक उत्तराखंड में फंसे हुए लोगों की जान बचाने की जुगत में भिड़े हैं, सात-आठ दिन से ! लगातार ! उनका जज़्बा है जो बड़े सलाम का असल हक़दार है !
                                             
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यह नरेंद्र मोदी को "फ़ैंटम" के रूप में पेश करने की क़वायद है... 

 
"नरेंद्र मोदी आया, और पंद्रह हज़ार गुजरातियों को बचाकर ले गया."
यह नरेंद्र मोदी को "फ़ैंटम" के रूप में पेश करने की क़वायद है. अब कॉमिक्स तैयार होंगे! नई किस्म के स्टिकर्स बनेंगे ! नई किस्म के मास्क बनेंगे !
ग़ज़ब करता है अपना मीडिया भी ! यह पूछने-सत्यापित करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई ( जैसे नवभारत टाइम्स को भी नहीं हुई) कि आखिर कैसे? कहां से? क्या सब गुजराती एक स्थान पर आ मिले थे, केदारनाथ के चमत्कार-स्वरूप? यह भी कि वह मरने से बचायेगा भी गुजरातियों को ही? क्योंकि यहां आने वाले तो सभी हिंदू ही होंगे ! हमारी जां-बाज़ सेना के इतने दिन के अथक प्रयत्नों से जो उपलब्धि हुई, उससे ज़्यादा वह एक दिन में ही कर गया? इनोवा गाड़ियों से? कितने हेलिकॉप्टर थे? हो तो कितने ही सकते थे क्योंकि टाटाओं, अंबानियों, और न जाने किन-किन को तो एक इशारा ही काफ़ी था ! कोई यह भी नहीं पूछ रहा कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार को "केदारनाथ-मंदिर को संवारना" ही सबसे "पहली और बड़ी प्राथमिकता" लगी? और क्या यह शुभ लक्षण है?
तो अब उम्मीद अयोध्या पर नहीं, केदारनाथ पर आकर टिक गई है? आपदाओं का दोहन, और धार्मिक उन्माद पैदा करने से लोकतंत्र क़तई मज़बूत नहीं होता, फ़ासिज़्म आता है !
मीडिया ज़र-खरीद गुलाम की तरह आचरण कर रहा है.
                                              
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नेक इरादे, मासूम सवाल
 

नेक इरादों वाले मित्र भी कितने मासूम होते हैं ! अब देखिए न, कई मित्र यह सवाल पूछ रहे हैं कि ( इस देश के कॉरपोरेट्स तो नंबर एक के स्वार्थी है, उनकी तो बात ही न करें !) देश के पांच सात बड़े मंदिरों के पास लाखों करोड़ रुपये जमा हैं, जो इन्हें बतौर चढावा मिले हैं, उसमें से ये केदारनाथ आपदा-ग्रस्त लोगों के लिए कुछ भी निकालकर क्यों नहीं दे रहे? मेरा कहना है कि यह उम्मीद सिरे ही से ग़लत है क्योंकि ये सिर्फ़ "लेते" हैं. "देना" इनके शब्दकोश में है ही नहीं. चढावे किसी भगवान के निमित्त हों, "कब्ज़ा" सच्चा होता है. "चढावा किसका? कब्ज़ा जिसका !"
                                              
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पानी खोज लेता है नए रास्ते, मुख्यधारा में जा मिलने के लिए !


एक मित्र ने लिखा "पानी अपना रास्ता नहीं बदलता." सही ही लगता है. पर आंशिक संशोधन के साथ मेरा कहना है कि पानी का रास्ता रोकोगे, तो पानी अपने पुराने रास्ते पर चल पड़ने के लिए खोज लेगा नए-नए रास्ते. और इस प्रक्रिया में गर्वोन्मत्त खड़े विशाल भवन नींव से कटकर खड़े-खड़े बह जाएंगे पानी की तेज़ धार में.
आप अपने उद्देश्य की पूर्ति में विफल होंगे, और पानी पूरी तरह सफल. एक सीमा तक ही बर्दाश्त करती है प्रकृति, अपने साथ छेड़छाड़, और फिर जब बिफरती है तो तबाही मचा देती है. इस तबाही का दोष प्रकृति के मत्थे मंढने की कोशिशें अपने पापों और अपराधों पर पर्दा डालने का ही दूसरा रूप है.
                                                 
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इतिहास ऐसे भी बदला लेता है

किसी को "भारतीयकरण" का नारा देने वाले बलराज मधोक की याद है?
इतिहास कितना निर्मम हो जाता है, कितनी ही बार !
जो अपना नगाड़ा ढम-ढम करके पूरे देश में उत्तेजनापूर्ण बहस चला दे, उसके "होने-न होने" का किसी को ध्यान भी न रहे, इसे इतिहास के सबक़ के रूप में भी देखा जाना चाहिए.
पर हां, यह तो चालीस से तीन-चार अधिक साल पहले की बात है.
                                                  
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''फ़ासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग़ सिर्फ़ नेता के पास होता है , बाक़ी सब कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ़ शरीर होता है.''  (हरिशंकर परसाई)

अब देखिए न, नेता के आदेश से "धर्म-जय" का उद्घोष हो गया कि दैवीय चमत्कार के रूप में मंदिर बच गया ! वास्तव में बच भी गया क्या? "नंदी" का चबूतरा भी मंदिर का ही हिस्सा था न? और जो दूसरा मंदिर बहता चला गया? और ऋषिकेश में गंगा की धार पर खड़ी शिव की वह विराट मूर्ति जो अब कहीं नहीं दिखती? हजारों घरों के ध्वस्त हो जाने को क्या कहेंगे? लाखों लोगों के बेघर हो जाने को क्या कहेंगे? पचहत्तर हज़ार से ज़्यादा फंसे हुए यात्रियों को? जिन्हें लापता बताया जा रहा है, उनकी गिनती "मरे हुओं" में न हो, यह सूचना तंत्र की सीमा है. अंततः लापता मृतकों में नहीं गिने जाएंगे क्या? मनुष्य-जीवन और उसकी संपदा के पक्ष में चमत्कार क्यों नहीं हुआ. ऐसा चमत्कार क्यों नहीं हुआ कि सभी दर्शनार्थी और सैलानी बचे रह जाते? और यह भी कि सरकार को यह नहीं कहना पड़ता कि "धाम" के कपाट दो साल तो क्या, एक दिन के लिए भी बंद नहीं होंगे? क्या "चमत्कार-कर्ता" को यह पता था कि यह सब सिर्फ़ बादल के फटने से नहीं हुआ बल्कि भू-खनन-माफ़िया और राजनीतिक नेताओं की मिलीभगत से हुए अंधाधुंध निर्माण-कार्य और वृक्षों की ह्रदय-हीन कटाई के परिणामस्वरूप हुआ है? पर मंदिर की मान्यता के लिए भी तो ये होटल-धर्मशालाएं और गैस्ट हाउस ज़रूरी थे न? और ये सब प्रकृति के नियमों को अंगूठा दिखाते हुए नदी-किनारे ही बने थे. विज्ञापन में अच्छा लगता है न - एकदम नदी किनारे ! चमत्कार करने वाले को भी क्या नैसर्गिक सौंदर्य पसंद नहीं रह गया था?
इस प्रलय-जैसी तबाही में (मनुष्य को ग़ायब करके) किसी "दैवीय चमत्कार" के रूप में महिमा-मंडित करने वाले तत्व कैसा समाज बनाना चाहते हैं, यह एकदम साफ़ है. जो मंदिरों को मनुष्य की श्रेष्ठतम धरोहर के रूप में पेश करने का धंधा करते हैं, वे किस दर्ज़े के मनुष्य-विरोधी हैं, यह और खुलासा करने का मतलब है पाठकों की बुद्धि और सोचने-समझने के सामर्थ्य को प्रश्नांकित करना. यह अपराध मैं नहीं करूंगा. 

-मोहन श्रोत्रिय 

देखो यह आभार-प्रदर्शन !


उन्नीस सौ साठ के दशक के मध्य में एक गीत सुना था, कवि सम्मेलन में. यदि सही याद है, तो गीतकार मोहन अंबर का था. लगभग पूरा याद भी था. अब कुछ टुकड़े ही याद रह गए हैं. कल से गीत के दो अंतरों की आखिरी पंक्तियां बेसाख्ता याद आ रही हैं. मैंने पहले भी कभी कहा था कि कौन चीज़ कब और क्यों याद आजाए, इसकी तार्किक व्याख्या नहीं की जा सकती. मानव-मन के खेल निराले होते हैं !
बहरहाल, गीत की वे चार पंक्तियां यों हैं :


देखो शूल बिछाने वालो, यह मेरा आभार-प्रदर्शन
जितनी डगर न मैं चल पाऊं, उतनी डगर तुम्हें मिल जाए.
...

...
...
देखो धूल उड़ाने वालो, मैं बदला ऐसे लेता हूं
धुंध-अंजे मेरे नयनों की सारी नज़र तुम्हें मिल जाए.

उस समय के ढेर सारे गीत याद हैं, टुकड़ा-टुकड़ा, जिनमें जीवन के अनुभव बोलते थे, और सहृदय श्रोता के मन को छू लेते थे, अपनी सहज रूप से संप्रेषित अर्थवत्ता के कारण.

-मोहन श्रोत्रिय 

''ज़िंदगी वेद थी, पर जिल्द बंधाने में कटी''


नीरज के एक मुक्तक की यह पंक्ति यों ही याद नहीं आ गई. हुआ यह कि अभी थोड़ी देर पहले बाज़ार गया. मिक्सर का जार ठीक करने के लिए छोड़ आया था परसों, उसे लेने गया था. उसे लेकर, और पैसे देकर जैसे ही पलटा तो एक बेहद पहचाने हुए से शख्स को अपनी ओर देखते पाया. चेहरा पहचाना हुआ हो, और नाम याद न आए तो बड़ी कोफ़्त होती है. अपनी बढती उम्र का अहसास कचोटने भी लगता है. परेशानी से बचने के लिए मैंने तुरत यह स्वीकार कर लिया कि मुझे उनका नाम याद नहीं आ रहा है. वह हंसे, और बोले : "ग़नीमत है, आपको मेरा चेहरा याद है, जबकि यह बहुत बदल गया है. कम ही लोग पहचानते हैं. नाम तो बदला भी नहीं है, पर अक्सर लोग चेहरे और नाम को जोड़ नहीं पाते हैं." इतना सुनना था कि मुझे उनका नाम भी याद आ गया. चेहरे पर न जाने कितने युद्धों की इबारत लिखी हुई थी, पर बोलने का उनका अंदाज़ अभी भी वही था, जो क़रीब तीस साल पहले कई दिन तक साथ रहने के कारण स्मृति में रच-बस गया था. या कहिए स्मृति में पंजे गड़ा कर बैठ गया था.
मैंने उनसे पूछा कि वह अभी भी गीत लिखते हैं क्या ! उत्तर में संक्षेप में उन्होंने अपनी राम-कहानी सुनाई कि कैसे उनके मकान पर दबंग और रसूख वाले किरायेदार ने कब्ज़ा कर लिया था, और उन्हें दर-बदर कर दिया था ! कैसे एक खास दोस्त और वर्षों के सहकर्मी ने "अपना किया" उनके सिर पर "मंढ कर" उन्हें नौकरी से निकलवा दिया था ! जितनी यंत्रणा उन्होंने झेली उसकी वजह से लिखना-पढ़ना तो बंद होना ही था. हल्की-सी हंसी की झलक दिखाकर वह बोले, " मेरी ज़िंदगी तो महाभारत में बदल गई, किन-किन कौरवों से जूझूं, अकेला ही." अपना कोई स्थाई ठीया- ठिकाना न होने, और ज़्यादा देर तक साथ न रह सकने की मजबूरी की बात कहकर वह यह वादा तो कर गए कि एक बार मिलने तो आएंगे ही. लगता है, वह वादा निभाएंगे. निभाते हैं, तो उनकी कहानी के बाक़ी हिस्से, बाद में!

कहने की ज़रूरत नहीं है, कि उनसे मिलना सुखद और प्रीतिकर लगा, पर उनकी अधूरी कहानी ने ही बेहद कष्ट पहुंचाया. एक भला आदमी कितना निरीह बन जा सकता है, कितना लाचार और निस्सहाय ! प्रतिभा और सृजन-क्षमता तो ऐसे में चली जाती है, तेल लेने ! एक बहुमूल्य जीवन की सारी रचनात्मकता जैस जिल्दसाज़ के यहां पड़ी हुई हो, और उनके पास जिल्दसाज़ी की क़ीमत अदा करने जितनी भी क्षमता न बची हो.

क्या-क्या बन जाना चाहते हैं बच्चे !


छोटे-छोटे बच्चे थे सब जो
खेल रहे थे पार्क में
उनके साथ थी एक युवती
गुरु-गंभीर
चश्मे में से अलग तरह से झांकती थीं
उसकी आंखें सम्मोहित-सी करती बच्चों को.
खेल-खेल में वह पूछ रही थी उनसे
क्या बनकर बहुत खुश होंगे वे !

बच्चों ने प्रश्न को अपनी तरह से समझा
और एक-एक करके बताने लगे अपनी इच्छा
टोका नहीं युवती ने
यह भी पता चलने नहीं दिया कि उसे
अलग तरह के उत्तरों की थी अपेक्षा
वह खुश थी कि बच्चे बोल रहे हैं
कि बच्चे सपने देखते हैं
कि बच्चे बेझिझक अपने सपनों को बांट रहे हैं औरों के साथ.

बच्चे भी ग़जब थे
कुछ-कुछ अजब भी थे
एक बन जाना चाहता था पंखा अपनी मां के लिए
कि वह हाथ से हवा झल सके भीषण गर्मी मे
जब बिजली चली गई हो
दूसरे का मन था ठंडे पानी का सरोवर बन जाने का
कि उसके सपनों की सफ़ेद बतखें तैरती रह सकें निर्बाध
तीसरा तितली बन जाना चाहता था कि रह सके निरंतर
फूलों के संग-साथ
चौथी, जो प्यारी-सी छुटकी थी बन जाना चाहती थी तारा
स्थित हो जाना चाहती थी एकदम उस तारे के पास
जिसके बारे में बताया गया था उसे कि वह तारा तो
उसकी मां का ही रूप है, बदला हुआ
और इसीलिए जब भी वह देखती थी उस तारे को तो उसमें
नज़र आती थी उसे उसकी मां
बिलकुल वैसी ही जैसी थी वह जब तक वह यहां थी
(छुटकी का नहीं हुआ था परिचय "मरना" नामक क्रिया से).

आगे भी चलता निश्चय ही यह सिलसिला
रोचक-मनमोहक-ज्ञानवर्धक
पर इतने में ही बज उठा अलार्म
गुस्से में उठा मैं इस दुर्लभ सपने के टूट जाने से
पर निकलना तो था ही मुझे प्रातःकालीन सैर पर.

टहलते-टहलते गुस्से की जगह ले ली
विरल अनुभव से गुज़रने के तोष ने.  

-मोहन श्रोत्रिय

नया भाषा-संस्कार


भाषा-चेतस शरीफ़ लोग जिनसे सहमत नहीं होते, या जिन्हें अपने विरोधियों के रूप मे देखते हैं, उन्हें शोहदे का ख़िताब देकर सम्मानित करते हैं. अगले ही दिन उन्हें फ़ेसबुक के पंडे कहकर सम्मानित करते हैं. तीस दिन में तीस नए शब्द ख़िताब  का दर्ज़ा पा लेंगे, यह तय दिखता है क्योंकि हर दिन कुछ-न-कुछ ऐसा होता ही रहेगा कि पुराना ख़िताब नाकाफ़ी लगने लगेगा.
हर शब्द, उसे बरतने वाले व्यक्ति के मनोभावों-मनोदशाओं को प्रतिबिंबित करता है, ऐसा सुनते आए हैं, बचपन से. बचपन चाहे साठ बरस पीछे छूट गया हो, पर तब की बातें अभी तक चेतना में गुंथी हुई हैं. आप इन्हें संस्कार कह सकते हैं, यदि इसमें रूढिवादिता और पुराणपंथीपन की गंध न आए तो !
उस समय के शिक्षक हर बताई गई बात की गांठ बांध लेने का निर्देश दिया करते थे. अब वे गांठें खुल ही नहीं पाती तो क्या करूं? आप मुझे अतीत-जीवी कहने-मानने को स्वतंत्र तो हैं ही, मेरे बिना कहे भी.
निस्संग भाव से सोचकर देखें कि यह रुके, तो अच्छा नहीं रहेगा/लगेगा क्या? मन में पीड़ा-भाव न होता तो यह लिखने को विवश न होता.