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Saturday, 13 August 2011

सुबह होगी - रसूल रज़ा

( एक चालीस साल पुरानी रूसी कविता जो मुझे बहुत प्रिय है, उसका उतना ही पुराना अनुवाद)


चारों हम मिले थे --
आशा
संदेह 
व्यथा 
और मैं.

आधी रात का वक्त था 
बरसात हो रही थी
और हवा दनदना  रही थी 

आशा बोली :
बरसात थम जाएगी
हवा का ज़ोर भी चुक जाएगा 
रात बीतेगी 
उगेगा दिन 
उदय होगा सुनहरा सूर्य.

संदेह ने कहा 
लेकिन कब?
पूछता हूं फिर कि आखिर कब?
पानी बदल जाए बरफ में तो?
हवा ले आए यदि तूफ़ान तो?
ठहर जाए अगर यह रात तो?

व्यथा बोली :
अगर बरसात थम भी जाए 
और हवा का ज़ोर भी चुक जाए 
तो क्या?
सुबह के पास ऐसा है ही क्या 
जो कर दे शांत 
मेरे भीतर की अकेली 
चीखती आवाज़ को?

आशा ने दिया तर्क 
संदेह ने विरोध किया 
संदेह ने दिया तर्क 
व्यथा ने नकार दिया.
और मैं?
मैं सुनता रहा बातें इन तीनों की
आशा की 
संदेह की 
व्यथा की.
और इंतज़ार करता रहा पौ फटने का 
सुनहरी भोर का.
मैंने नहीं पूछा
कि भोर कब होगी 
कि क्या लाएगी वह अपने साथ ?
ख़ामोशी के क्षणों में 
मैं सुनता रहा आशा की खुसर-फुसर
बोलो!
मुझसे बोलो!

अनुवाद: मोहन श्रोत्रिय