Thursday, 13 September 2012

सबसे ख़तरनाक (पाश)

विडंबना देखिए कि इस महान कवि की इस महान कविता को एनसीईआरटी की ग्यारहवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक से निकलवाने की मांग राज्यसभा में भाजपा के सांसद रविशंकर प्रसाद सिंह ने की थी, जो पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी होने के साथ-साथ पार्टी के प्रवक्ता भी हैं. इनकी यह मांग क्या पार्टी की मांग के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए? खालिस्तानी उग्रवादियों के खि़लाफ़ खम ठोक कर खड़े होने वाले, और उन्हीं की गोलियों का निशाना बने इस परम देशभक्त, बड़े कवि के बारे में इस पार्टी व इसके नेताओं की यह समझ साहित्य-संस्कृति के लिए कितनी ख़तरनाक साबित हो सकती है !

पाश की कविता
सबसे ख़तरनाक
 
श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना - बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना - बुरा तो है
भींचकर जबड़े बस वक्‍त काट लेना - बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वह आंख होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी ठण्डी बर्फ़ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अंधेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणता को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सबसे ख़तरनाक वह चांद होता है
जो हर हत्‍याकाण्ड के बाद
वीरान हुए आंगनों में चढ़ता है
लेकिन तुम्हारी आंखों में मिर्ची की तरह नहीं गड़ता है

सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुंचने के लिए
जो विलाप को लांघता है
डरे हुए लोगों के दरवाज़े पर जो
गुण्डे की तरह हुंकारता है

सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ़ उल्लू बोलते गीदड़ हुआते
चिपक जाता सदैवी अंधेरा बंद दरवाज़ों की चौगठों पर

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाये
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाये

श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

(कविता विनायक काले की दीवार से, साभार. वहां "शेयर" का विकल्प उपलब्ध नहीं था.)

यह दौर , दिशाहारा निष्ठाओं का...

अभी नही आया है
समय कि मेरी आवाज़
पर जड़े जा सकें ताले.

माना कि यह दौर है
बेहद निर्मम और सटीक
पर्याय भी
कृतघ्नता का

दिशाहारा निष्ठाओं का
और विष-बेल की तरह
पल-पल बढ़ती स्वार्थपरता का !

फिर भी बहुत कुछ बचा है
ज़रूरत है जिसे
सहेजने-संवारने की !
कनफोडू शोर में
सबसे तेज़ आवाज़ें
हो सकती हैं बेशक खुद को
प्रचारित करने का सुगम
मार्ग अपनाने वालों की.
पर ये आवाज़ें दीर्घजीवी
नहीं हो सकतीं. क़तई नहीं
कभी किसी हाल में नहीं.
कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं होता
गाल बजाने वालों
और मदारियों
के बीच. दोनों की सफलता
बन सकती है बायस
अल्पजीवी तोष का ही !
न कम, न ज़्यादा.

चुनौतियों से जूझने का
होता है अपना ही मज़ा
भरोसा हो बस
अपनी नीयत पर
अपनी क्षमताओं पर
और गंतव्य की दूरी
तथा पहुंचने की अनिश्चितता
के बावजूद संगी-साथी बने हैं जो
उनके अविचल-अविकल
साथ-संकल्प पर.

कठिन से कठिन रास्ते और
बनैले पशुओं से आबाद
बीहड़ जंगल भी
हो जाते हैं पार
भरोसेमंद साथियों के साथ
वे चाहे कम हों संख्या में.
ऐसे साथी तो कम ही होंगे
पर कहीं बेहतर होंगे
भानुमती के कुनबे से !

-मोहन श्रोत्रिय

Monday, 10 September 2012

मुक्तिबोध की कविताएं

मुक्तिबोध की पुण्‍यतिथि के मौक़े पर उनकी तीन कविताएं तथा शमशेर और श्रीकांत वर्मा की संक्षिप्‍त टिप्‍पणियां. 
"मुक्तिबोध का सारा जीवन एक मुठभेड़ है. उनका साहित्य भी उस यथार्थ से मुठभेड़ की एक अटूट प्रक्रिया है जिससे जूझते हुए वह नष्ट हो गए.
हर रचना, उनके लिए, एक भयानक शब्दहीन अंधकार को - जो आज भी भारतीय जीवन को घेरे हुए है - लांघने की एक कोशिश थी. सारा इतिहास उनके लिए एक चुनौती था. मध्यवर्ग इस इतिहास की गुत्थी है, जिसे मुक्तिबोध समझना-सुलझाना चाहते थे. उनके चारों ओर मध्यवर्ग का नैराश्य, कुंठा, अवसाद, आत्म-वंचना, आत्म-परस्ती थी. इस संकट को, मध्यवर्ग के इस संकट को जितना मुक्तिबोध ने समझा किसी अन्य कवि ने नहीं..."

-श्रीकांत वर्मा
"मुक्तिबोध के साहित्य में हमारे संस्कारों को संवारने और उन्हें ऊंचा उठाने की बड़ी शक्ति है. वह हम मध्यवर्गीय पाठकों की दृष्टि को साफ़ करता है, समझ बढ़ाता है."
-शमशेर
"अब अभिव्यक्ति के ख़तरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब...
पहुंचना ही होगा दुर्गम
पहाड़ों के पार."

-मुक्तिबोध

पूंजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि

इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन

मुझे नहीं मालूम

मेरी प्रतिक्रियाएं
सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ
सच, हूं मात्र मैं निवेदन-सौंदर्य

सुबह से शाम तक
मन में ही
आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूं
अपनी ही काटपीट

ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि
इतना उलझ जाता हूं कि
ज़हर नहीं
लिखने की स्याही में पीता हूं कि
नीला मुंह...
दायित्व-भावों की तुलना में
अपना ही व्यक्ति जब देखता
तो पाता हूं कि
खुद नहीं मालूम
सही हूं या गलत हूं
या और कुछ
 

सत्य हूं कि सिर्फ़ मैं कहने की तारीफ़
मनोहर केंद्र में
खूबसूरत मजे़दार
बिजली के खंभे पर
अंगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार
तड़ित-प्रकाश-दीप...
खंभे के अलंकार!!

सत्य मेरा अलंकार यदि, हाय
तो फिर मैं बुरा हूं.
निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और
व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार
बिजली के खंभे की भांति ही
कंधों पर रख मैं
विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कांति-रश्मि-दीप
निज के हृदय-प्राण
वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त
यदि करता हूं तो....
दोष तुम्हारा है

मैंने नहीं कहा था कि
मेरी इस ज़िंदगी के बंद किवाड़ की
दरार से
रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर
प्रत्यावर्तित होती रहो
मनोज्ञ रश्मि की लीला बन
होती हो प्रत्यावर्तित विभिन्न कोणों से
विभिन्न शीशों पर
आकाशीय मार्ग से रश्मि-प्रवाहों के
कमरे के सूने में सांवले
निज-चेतस् आलोक

सत्य है कि
बहुत भव्य रम्य विशाल मृदु
कोई चीज़
कभी-कभी सिकुड़ती है इतनी कि
तुच्छ और क्षुद्र ही लगती है!!
मेरे भीतर आलोचनाशील आंख
बुद्धि की सचाई से
कल्पनाशील दृग फोड़ती!!

संवेदनशील मैं कि चिंताग्रस्त
कभी बहुत कुद्ध हो
सोचता हूं
मैंने नहीं कहा था कि तुम मुझे
अपना संबल बना लो
मुझे नहीं चाहिए निज वक्ष कोई मुख
किसी पुष्पलता के विकास-प्रसार-हित
जाली नहीं बनूंगा मैं बांस की
चाहिए मुझे मैं
चाहिए मुझे मेरा खोया हुए
रूखा सूखा व्यक्तित्व

चाहिए मुझे मेरा पाषाण
चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन
कौन हो कि कहीं की अजीब तुम
बीसवीं सदी की एक
नालायक ट्रैजेडी

ज़माने की दुखांत मूर्खता
फैंटेसी मनोहर
बुदबुदाता हुआ आत्म संवाद
होठों का बेवकूफ़ कथ्य और

फफक-फफक ढुला अश्रुजल


अरी तुम षडयंत्र-व्यूह-जाल-फंसी हुई
अजान सब पैंतरों से बातों से
भोले विश्वास की सहजता
स्वाभाविक सौंप
यह प्राकृतिक हृदय-दान
बेसिकली ग़लत तुम।

....ओ मेरे आदर्शवादी मन


ओ मेरे सिद्धांतवादी मन
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया ?
उदरंभरि बन अनात्म बन गए
भूतों की शादी में कनात से तन गए
किसी व्यभिचारी के बन गए बिस्तर
दुखों के दागों को तमगों-सा पहना
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना
असंग बुद्धि व अकेले में सहना
ज़िंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर
अब तक क्या किया ? जीवन क्या जिया ! !
बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए
करूणा के दृश्यों से हाय ! मुंह मोड़ गए
बन गए पत्थर
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया
दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम !
लोक-हित पिता को घर से निकाल दिया
जन-मन करूणा-सी मां को हकाल दिया
स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया
भावना के कर्त्तव्य -- त्याग दिए
हृदय के मंतव्य -- मार डाले
बुद्धि का भाल ही फ़ोड दिया
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए
जम गए, जाम हुए, फंस गए
अपने ही कीचड़ मे धंस गए
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए !
अब तक क्या किया ? जीवन क्या जिया ?
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम ! !
(लंबी कविता 'अंधेरे में' से)

तीन कविताएं

मामला ज़िंदगी का

पैबंद जो लगे हैं
यहां-वहां
क्या हासिल होगा
उन्हें छिपाने से?
और उन्हें देख
लजाने से,
नज़रें चुराने से?

मामला ज़िंदगी का है
सिर्फ़ कपड़ों का नहीं !

 
क्या से क्या हो गया!

चढ़ा तो बहुत
धीरे-धीरे था वह
पर जब गिरा तो
कोई वक़्त ही
नहीं लगा. लुढ़कना शुरू
हुआ नहीं कि आ पड़ा
औंधे मुंह
धरती पर, निश्शब्द

निश्चेतन.
'चढ़ने' का विलोम
हर हाल में
'उतरना' ही नहीं होता,
'लुढ़कना' भी होता है,
जिसमें प्रयत्न-प्रतिरोध की
नहीं होती कोई गुंजाइश!
हालांकि लुढ़कना भी
होता है परिणाम
खुद ही की नासमझी का
भूल का!

पर समझाए कौन?
और क्यों?
किसी को काटा थोड़े है
काले कुत्ते ने !

विवशता आदिवासियों की
 
कविता में आती है
आदिवासियों की व्यथा-कथा.
निजी आयोजनों में
नाच दिखाने की
उनकी विवशता
कब जगह पाएगी कविता में?
जिस नाच के साक्षी ही नहीं,
उसमें शरीक भी रहे हों कवि
पूरी उन्मुक्तता और
उन्मत्तता के साथ?
 
-मोहन श्रोत्रिय

Wednesday, 8 August 2012

आह मेरे लोगो ! ओ मेरे लोगो ! - कात्यायनी की ऐतिहासिक महत्‍व की कविता


कात्‍यायनी की कविता में संवेदना और विचार का एकाकार एक अत्‍यंत विरल परिघटना है. एक घनघोर मानवीय त्रासदी पर हिंदी में कदाचित यह सर्वश्रेष्‍ठ रचना है. गुजरात को यह किसी अकेली या अपवादस्‍वरूप घटना के रूप में न देखकर समकालीन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के विद्रूप को सामने लाकर यह कविता सामाजिक बदलाव को प्रतिश्रुत साहित्‍यकारों का आह्वान भी करती है कि वे फ़ौरी और दीर्घकालिक दोनों तरह के कार्यभारों के निर्वहन के लिए इकट्ठा हों.


आह मेरे लोगो ! ओ मेरे लोगो !
(गुजरात---2002)


धुआं और राख और जली-अधजली लाशों
और बलात्कृत स्त्रियों-बच्चियों और चीर दिए गर्भों
और टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए शिशु-शरीरों के बीच,
कुचल दी गई मानवता, चूर कर दिए गए विवेक और
दफ्न कर दी गई सच्चाई के बीच,
संस्कृति और विचार के ध्वंसावशेषों में
कुछ हेरते, भटकते,
रुदन नहीं सिसकी की तरह,
उमड़ते रक्त से रुंधे गले से
बस निकल पड़ते हैं नाज़िम हिकमत के ये शब्द :
'आह मेरे लोगो !'
'साधो, ये मुर्दों का गांव'
--सुनते हैं कबीर की धिक्कार.
नहीं है मेरा कोई देश कि रोऊं उसके लिए :
'आह मेरे देश !'
नहीं है कोई लगाव इस श्मसान-समय से, कि कहूं :
'आह मेरे समय !'
इन दिनों कोई कविता नहीं,
सीझते-पकते फ़ैसलों के बीच, बस तीन अश्रु-श्वेद-रक्त-स्नात शब्द :
'आह मेरे लोगो !'

दर-बदर भटकते ब्रेष्ट का टेलीग्राम कल ही कहीं से मिला,
अभी आज ही सुबह आया था
कॉडवेल, राल्फ़ फॉक्स, डेविड गेस्ट आदि का भेजा हुआ हरकारा
पूछता हुआ ये सवाल कि एक अरब लोगों के इस देश में
क्या उतने लोग भी नहीं जुट पा रहे
जितने थे इंटरनेशनल ब्रिगेड में
क्या हैं कुछ नौजवान इंसानियत की रूह में हरक़त पैदा करने के लिए
कुछ भी कर गुज़रने को तैयार?- पूछा है भगत सिंह ने.
ग़दरी बाबाओं ने रोटी के टुकड़े पर रक्त से
लिख भेजा है संदेश.

महज मोमबत्तियां जलाके, शांति मार्च करके,
कहीं धरने पर बैठने के बाद घर लौटकर
हम अपनी दीनता ही प्रकट करेंगे
और कायरता भी और चालाकी भरी हृदयहीनता भी
शताब्दियों पुराने कल्पित अतीत की ओर देश को घसीटते
हत्यारों का इतिहास तक़रीबन पचहत्तर वर्षों पुराना है.
धर्म-गौरव की मिथ्याभासी चेतना फैलती रही,
शिशु मंदिरों में विष घोले जाते रहे शिशु मस्तिष्कों में,
विष-वृक्ष की शाखाएं रोपी जाती रहीं मोहल्ले-मोहल्ले,
वित्तीय पूंजी की कृत्या की मनोरोगी संतानें
वर्तमान की सेंधमारी करती हुई,
भविष्य को गिरवी रखती हुई,
अतीत का वैभव बखानती रहीं
और हम निश्चिन्त रहे
और हम अनदेखी करते रहे
और फिर हम रामभरोसे हो गए
और फिर कहर की तरह बरपा हुआ रामसेवक समय.
अभी भी हममें से ज्यादातर रत हैं
प्रतीकात्मक कार्रवाइयों और विश्लेषणों में, पूजा-पाठ की तरह
अपराध-बोध लिए मन में.

ये समय है कि
वातानुकूलित परिवेश-अनुकूलित
गंजी-तुंदियल या छैल-छबीली वाम विद्वत्ताओं से
अलग करें हम अपने आपको,
संस्‍कृति की सोनागाछी के दलालों के साथ
मंडी हाउस या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में
कॉफ़ी पीने का लंपट-बीमार मोह त्यागें,
हमें
निश्चय ही'
निश्चय ही,
निश्चय ही,
अपने लोगों के बीच होना है.
हमें उनके साथ एक यात्रा करनी है
प्रतिरक्षा से दुर्द्धर्ष प्रतिरोध तक.
इस फ़ौरी काम के बाद भी हमें सजग रहना होगा.
ये हमलावर लौटेंगे बार-बार आगे भी, क्योंकि
विनाश और मृत्यु के ये दूत,
पीले-बीमार चेहरों की भीड़ लिए अपने पीछे
चमकते चेहरे वाले ये लोग ही हैं
इस तन्त्र की आखिरी पंक्ति.

सहयात्रियों का हाथ पकड़कर कहना चाहते हैं हम उनसे,
साथियो ! दूरवर्ती लक्ष्य तक पहुंचने के रास्ते और रणनीति के बारे में
अपने मतभेद सुलझाने तक,
तैयारी के निहायत ज़रूरी, लेकिन दीर्घकालिक काम निपटने तक
हम स्थगित नहीं रख सकते
अपना फ़ौरी काम.
गुजरात को न समझें एक गुजरी हुई रात.
इस एक मुद्दे पर हमें
एक साथ आना ही होगा.
'आह मेरे लोगो' - इतना कहकर अपनी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें
कि एक स्वर से आवाज़ दें :'ओ मेरे लोगो!'
-ये तय करना है हमें
अभी, इसी वक़्त !


कूपमंडूक की कविता

क्यों कोसते हो इतना?
हम तो किसी का
कुछ नहीं बिगाड़ते ।

न ऊधो का लेते हैं
न माधो को देते हैं ।

संतोष को मानते हैं परम सुख ।
रहते हैं वैसे ही
जाहि बिधि रखता है राम ।

बिधना के विधान में
नहीं अड़ाते टांग।
जगत-गति
हमें नहीं व्यापती
तो तुमको क्या?

तुमको क्यों तकलीफ़ कि
हमारा आसमान छोटा-सा है
कुएं के मुंह के बराबर?

हमने क्या बिगाड़ा है
जो कोसते हो इतना

पानी पी-पीकर?


या कि होगा 

एक दिन
पर्यावरण की सुरक्षा पर
कोई कार्यक्रम नहीं हुआ.
जनसंख्या-विस्फोट पर
नहीं प्रकट की गई कोई चिंता.
कला की शर्तें
पूरी करने के लिए
नीलामी नहीं बोली गई
सच की, या ईमान की

एक दिन
मृत्यु नहीं हुई किसी कवि की
या कविता की
नहीं बैठा कोई विद्वान
किसी पूर्वज की पीठ पर
न ही कोई पुरस्कार बंटा
न तालियां बजीं.
उस दिन
कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त
करने की
कोई नई कोशिश नहीं हुई
न कोई हत्या,डकैती,राहजनी हुई
न कोई व्यापार-समझौता ।
उस दिन
नहीं छपे पूरी दुनिया के अखबार ।

अद्भुत था वह एक दिन
जो नहीं था
वास्तव में कभी
पर सोचते हैं सभी
कि था कभी ऐसा एक दिन
जीने के वास्ते
या कि होगा ?

परसाई के तीर

हरिशंकर परसाई का व्‍यंग्‍य कितना ही पुराना हो जाए, ऐसा लगता है जैसे आजकल में ही लिखा गया है. यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्‍य ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्‍य में उनके क़द का कोई दूसरा लेखक नहीं दिखता. इसे दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि विदेशी भाषाओं में उनके लेखन का अनुवाद नहीं हो पाया, वरना यह बात बड़े इत्‍मीनान के साथ कही जा सकती है कि उनकी गिनती दुनिया के श्रेष्‍ठ लेखकों में होती. 

"मैं लेखक छोटा हूं, पर संकट बड़ा हूं."

"हमारी हज़ारों साल की महान संस्कृति है और यह समन्वित संस्कृति, यानी यह संस्कृति द्रविड़, आर्य, ग्रीक, मुस्लिम आदि संस्कृतियों के समन्वय से बनी है. इसलिए स्वाभाविक है कि महान समन्वित संस्कृति वाले भारतीय व्यापारी इलायची में कचरे का समन्वय करेंगे, गेहूं में मिट्टी का, शक्कर में सफ़ेद पत्थर का, मक्खन में स्याही सोख काग़ज़ का. जो विदेशी हमारे माल में "मिलावट" की शिकायत करते हैं, वे नहीं जानते कि यह "मिलावट" नहीं "समन्वय" है जो हमारी संस्कृति की आत्मा है. कोई विदेशी शुद्ध माल मांगकर भारतीय व्यापारी का अपमान न करे."

"अगर दो साइकिल सवार सड़क पर एक-दूसरे से टकराकर गिर पड़ें तो उनके लिए यह लाज़िमी हो जाता है के वे उठकर सबसे पहले लडें, और फिर धूल झाडें. यह पद्धति इतनी मान्यता प्राप्त कर चुकी है कि गिरकर न लड़ने वाला साइकिल सवार "बुज़दिल" माना जाता है, "क्षमाशील संत" नहीं."

"जब विद्यार्थी कहता है कि उसे "पंद्रह दिए", उसका अर्थ होता है कि उसे"पंद्रह नंबर "मिले" नहीं हैं, परीक्षक द्वारा "दिए गए" हैं. मिलने के लिए तो उसे पूरे नंबर मिलने थे. पर "पंद्रह नंबर" जो उसके नाम पर चढ़े हैं, सो सब परीक्षक का अपराध है. उसने उत्तर तो ऐसे लिखे थे कि उसे शत-प्रतिशत नंबर मिलने थे, पर परीक्षक बेईमान हैं जो इतने कम नंबर देते हैं. इसीलिए, कम नंबर पाने वाला विद्यार्थी "मिले" की जगह "दिए" का प्रयोग करता है.''

"बेचारा आदमी वह होता है जो समझता है कि मेरे कारण कोई छिपकली भी कीड़ा नहीं पकड़ रही है. बेचारा आदमी वह होता है, जो समझता है सब मेरे दुश्मन हैं, पर सही यह है कि कोई उस पर ध्यान ही नहीं देता. बेचारा आदमी वह होता है, जो समझता है कि मैं वैचारिक क्रांति कर रहा हूं, और लोग उससे सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं. वह आदमी सचमुच बड़ा दयनीय होता है जो अपने को केंद्र बना कर सोचता है."

"टुथपेस्ट के इतने विज्ञापन हैं, मगर हरेक में स्त्री ही 'उजले दांत' दिखा रही है. एक भी ऐसा मंजन बाज़ार में नहीं है जिससे पुरुष के दांत साफ़ हो जाएं. या कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस देश का पुरुष मुंह साफ़ करता ही नहीं है. यह सोचकर बड़ी घिन आई कि ऐसे लोगों के बीच में रहता हूं, जो मुंह भी साफ़ नहीं करते."

"जो नहीं है, उसे खोज लेना शोधकर्ता का काम है. काम जिस तरह होना चाहिए, उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है. जिस बीमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने देकर दूसरी बीमारी से मार डालना डॉक्टर का काम है. अगर जनता सही रास्ते पर जा रही है, तो उसे ग़लत रास्ते पर ले जाना नेता का काम है. ऐसा पढ़ाना कि छात्र बाज़ार में सबसे अच्छे नोट्स की खोज में समर्थ हो जाए, प्रोफ़ेसर का काम है."

"हम उत्पादक के लिए मनुष्य नहीं, उपभोक्ता हैं. हमारा कुल इतना उपयोग है कि हम खरीदार बने रहें."

"भारत की प्रतिष्ठा इसलिए भी बढ़ी है कि पुलिस लाठीचार्ज अब न के बराबर है. इससे दुनिया के लोग समझते हैं कि पुलिस अब बहुत 'दयालु' हो गई है. पर हमारी पुलिस अब सीधे गोली चलाती है, लाठीचार्ज के झंझट में नहीं पड़ती. गोली बनाने के कारखाने जनता के पैसे से चलते हैं, उनमें बना माल जनता के ही काम आना चाहिए."

"जनता उन मनुष्यों को कहते हैं जो वोटर हैं और जिनके वोट से विधायक तथा मंत्री बनते हैं. इस पृथ्वी पर जनता की उपयोगिता कुल इतनी कि उसके वोट से मंत्रिमंडल बनते हैं. अगर जनता के बिना भी सरकार बन सकती हो, तो जनता की कोई ज़रूरत नहीं है."

शशि प्रकाश की तीन छोटी कविताएं

शशिप्रकाश की ये कविताएं पंद्रह से बीस बरस पुरानी हैं,पर आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि लिखे जाने के वक्‍़त थीं. 

कठिन समय में विचार

रात की काली चमड़ी में
धंसा
रोशनी का पीला नुकीला खंजर.
बाहर निकलेगा
चमकते, गर्म लाल
खून के लिए
रास्ता बनाता हुआ.

शिनाख्त

धरती चाक की तरह घूमती है.
ज़िंदगी को प्याले की तरह
गढ़ता है समय.
धूप में सुखाता है.
दुख को पीते हैं हम
चुपचाप.

शोरगुल में मौज-मस्ती का जाम.
प्याला छलकता है.
कुछ दुख और कुछ सुख
आत्मा का सफ़ेद मेज़पोश
भिगो देते हैं.
कल समय धो डालेगा
सूखे हुए धब्बों को
कुछ हल्के निशान
फिर भी बचे रहेंगे.
स्मृतियां
अद्भुत ढंग से
हमें आने वाली दुनिया तक
लेकर जाएंगी.
सबकुछ दुहराया जाएगा फिर से
पर हूबहू
वैसे ही नहीं.

द्वंद्व

एक अमूर्त चित्र मुझे आकृष्ट कर रहा है.
एक अस्पष्ट दिशा मुझे खींच रही है.
एक निश्चित भविष्य समकालीन अनिश्चय को जन्म दे रहा है.
(या समकालीन अनिश्चय एक निश्चित भविष्य में ढल रहा है?)
एक अनिश्चय मुझे निर्णायक बना रहा है.
एक अगम्भीर हंसी मुझे रुला रही है.

एक आत्यन्तिक दार्शनिकता मुझे हंसा रही है.
एक अवश करने वाला प्यार मुझे चिंतित कर रहा है.
एक असमाप्त कथा मुझे जगा रही है.
एक अधूरा विचार मुझे जिला रहा है.
एक त्रासदी मुझे कुछ कहने से रोक रही है.
एक सजग ज़िंदगी मुझे सबसे कठिन चीज़ों पर सोचने के लिए मजबूर कर रही है.
एक सरल राह मुझे सबसे कठिन यात्रा पर लिए जा रही है.