Sunday, 9 October 2011

महेश पुनेठा की पांच कविताएं


महेश पुनेठा नए उभरते कवियों में अपनी देशज सहजता के कारण अलग से पहचाने जाने लगे हैं. जो संकोच उन्हें व्यक्ति के रूप में अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग खड़ा कर देता है, वह संकोच कहीं कहीं, किसी किसी रूप में, उनकी कविता की भी विशेषता बन जाता है. कविता में आने वाला हर शब्द जैसे बहुत ही हौले-से बोला जा रहा हो. पिछले महीने जोधपुर में पुनश्चर्या पाठ्यक्रम मेरे व्याख्यानों के दायरे में आने वाले वह दूसरे कवि थे. कहना होगा कि लीना की कविताओं से भिन्न स्वभाव और तेवर की होने के बावजूद महेश की कविताओं ने भी प्रतिभागियों का ध्यान अच्छे-से खींचा. पर जैसी कि वास्तविकता है, विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के अधिकांश हिंदी शिक्षक चूंकि पाठ्यक्रम के बाहर की चीज़ों में दिलचस्पी कम रखते हैं, उनका नाम भी प्रतिभागियों को परिचित-सा नहीं लगा. पर इसका एक फ़ायदा भी होता है कि श्रोता किसी तरह के पूर्वाग्रह से भी ग्रस्त नहीं होते, इसलिए वे कवि को जिस सन्दर्भ में और जिस तरह से पढ़ा-प्रस्तुत किया जा रहा हो, उससे तादात्म्य क़ायम करने की स्थिति में भी आसानी से जाते हैं.
महेश पुनेठा की कविताओं की खूबी यह है कि वह आसपास पड़े-बिखरे ढेर सारे विषयों में से किसी एक को उठाकर उसे कविता के अनुकूल बना लेते हैं, और सहज ढंग से कविता का रूप देकर उसे पाठक को संप्रेषित कर देते है. जब वह 'प्रार्थना' पर कविता लिखते हैं तो उनकी प्रार्थना उनके समकालीन यश-कामी कवि की प्रार्थना से एकदम भिन्न होती है; एक तरह से प्रार्थना के औचित्य को भी स्थापित कर देती है. अन्य कविताएं भी बिना किसी व्याख्या-विश्लेषण की मांग किए पाठक के मन को, बिना किसी आहट केबिना चौंकाए और चमत्कृत किए, छू कर गुज़र जाती हैं, और 'इनके होने की' 'सुवास' और 'आत्मीयता' देर तक मुग्ध किए रखती हैं. महेश पुनेठा बेशक पाठक की चेतना को झकझोरते नहीं हैं, पर यह आश्वस्ति का भाव ज़रूर देते हैं कि उन्हें अपनी जड़ों का अहसास है, और वह जीवनानुभव की ठोस ज़मीन पर खड़े हैं. 

प्रार्थना

विपत्तियों से घिरे आदमी का
जब
नहीं रहा होगा नियंत्रण
परिस्थितियों पर
फूटी होगी
उसके कंठ से पहली प्रार्थना
विपत्तियों से उसे
बचा पायी हो या नहीं प्रार्थना
पर विपत्तियों ने
 अवश्य बचा लिया प्रार्थना को.

इस बहरे वक्त में

खेलते हुए अन्य बच्चों के साथ
अपने साथ हो रहे खेड़ी का
विरोध कर रहा है मेरा बेटा
चिल्ला-चिल्लाकर
काफ़ी कर्कश
लग रही है आवाज़ उसकी
बार-बार जाने को होता हूं तैयार
कि रोकूं उसे
इस तरह चिल्लाने से
प्यार से भी
रखी जा सकती है अपनी बात
पर कुछ सोचकर
ठिठक जाते हैं क़दम
इस बहरे वक्त में
लगता है मुझे
ज़रूरी पूर्वाभ्यास की तरह
 उसका चिल्लाना.

संतोषम् परम् सुखम्

पहली-पहली बार
दुनिया बड़ी होगी एक क़दम आगे
जिसके क़दमों पर
असंतोषी रहा होगा वह पहला.

किसी असंतुष्ट ने ही देखा होगा
पहली बार सुंदर दुनिया का सपना

पहिए का विचार आया होगा
पहली-पहली बार
किसी असंतोषी के ही मन में
आग को भी देखा होगा पहली बार ग़ौर से
किसी असंतोषी ने ही.

असंतुष्टों ने ही लांघे पर्वत पार किए समुद्र
खोज डाली नई दुनिया

असंतोष से ही फूटी पहली कविता
असंतोष से एक नया धर्म

इतिहास के पेट में
मरोड़ उठी होगी असंतोष के चलते ही
इतिहास की धारा को मोड़ा
बार-बार असंतुष्टों ने ही

उन्हीं से गति है
उन्हीं से ऊष्मा
उन्हीं से यात्रा पृथ्वी से चांद
और
पहिए से जहाज़ तक की

असंतुष्टों के चलते ही
सुंदर हो पाई है यह दुनिया इतनी
असंतोष के गर्भ से ही
पैदा हुई संतोष करने की कुछ स्थितियां.

फिर क्यों
सत्ता घबराती है असंतुष्टों से
सबसे अधिक

क्या इसीलिए कहा गया होगा
संतोषम् परम् सुखम्.

घसियारिनें

ऐसे मौसम में
जब दूर -दूर तक भी
दिखाई देता हो तिनका
हरी घास का.
जब कमर में खोंसी दरांती पूछती हो
मेरी धार कैसे भर सकेगी
तुम्हारी पीठ पर लदा डोका
बावजूद इसके एक आशा लिए 
निकल पड़ती हैं घर से वे
इधर-उधर भटकती हैं
झाड़ी-झाड़ी तलाशती हैं
खेत और बाड़ी-बाड़ी
अनावृष्टि चाहे जितना सुखा दे जंगल
उनकी आंखों का हरापन नहीं सुखा सकती
आकाश में होगा तो वहां से लाएगी
पाताल में होगा तो वहां से
वे अंततः हरी घास लाती लौट रही हैं घर
जैसे उनके देखने भर से उग आयी हो घास

उनकी पीठ पर हरियाली से भरा डोका
किसिम-किसिम की हरियाली का एक गुलदस्ता है.

बदल गया है ज़माना

अब भी नहीं कर सकती हो तुम
एक पुरुष से दोस्ती
ठीक-ठीक उसी तरह
जैसे कि किसी एक स्त्री से
तुम चाहती हो दोस्ती करना
किसी ऐसे पुरुष से
जिससे  मिलते हों तुम्हारे विचार
भावों में हो जिसके निश्छलता 
जिससे बातें करना
लगता हो तुम्हें अच्छा
जिसके साथ काम करने में
तुम्हें महसूस होती हो सहजता
तुम कर सकती हो और बेहतर प्रदर्शन

लेने लगेंगे लोग
अतिरिक्त रुचि
तुम्हारे साथ-साथ काम करने पर
साथ-साथ चलने पर
आपस में बातें करने पर.

खोलने लगेंगे लोग
संबंधों के परतों के भीतर की परतें
लगी रहेंगी
छोटी-छोटी गतिविधियों पर भी नज़रें
करने लगेंगे कानाफूसी
लगने लगेगा लोगों को
कि हो रहा है कोई अनर्थ
जिसे रोका जाना
है उनका परम कर्तव्‍.

क्या ख़ाक़ बदला है ज़माना ?

Wednesday, 5 October 2011

A Birthday Wish


I'll wish you in a way
that you remember your birthday
because this is th day
when nothing goes the usual way
 
When flowers bloom
from day to night
the painful sun rays
run out of fright.
 
The pleasant breeze
calls all the nature
to sing for you
and become greater
 
Cause not everyone
gets a chance to sing for you
but the leaves and flowers do
along with the dew
 
The frost and the snow
go down so low
and on their knees
say-"accept our presents please"
 
And make the world look beautiful
so that you enjoy your day
and that's what I say
A very Happy Birthday

-Nishtha Sharma

लीना मल्‍होत्रा राव की तीन ताज़ा कविताएं

लीना मल्होत्रा राव कवि ( जान-बूझ कर 'कवयित्री' नहीं कह रहा ) के रूप में एक ऐसा नाम है जो दिनों दिन हिंदी कविता में अपना एक ख़ास मुक़ाम और ख़ास पहचान बनाता जा रहा है. अपने समकालीन अन्य कवियों से एक अलग पहचान. न केवल स्त्री-प्रश्नों पर वरन हम सब को छूने वाले किन्हीं भी प्रश्नों पर उनकी मुखरता पाठक को सीधे अपनी ओर आकृष्ट करने की अद्भुत क्षमता के रूप में व्यक्त होती है. अभी पिछले महीने जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और यूजीसी द्वारा आयोजित एक पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में समकालीन हिंदी कविता पर दिए गए चार (देने थे ६, पर अपने एक घनिष्ठ मित्र की मृत्यु का समाचार सुन कर चौथे व्याख्यान के बाद ही, बीच में कार्यक्रम छोड़कर, मुझे लौटना पड़ा ) व्याख्यानों में से एक मैंने लीना की कविताओं पर केंद्रित किया था. मुझे आप लोगों के साथ यह साझा करते खुशी है कि कई राज्यों से आए हिंदी के विश्वविद्यालयी एवं महाविद्यालयी शिक्षकों ने लीना की कविताओं को सर्वाधिक सराहा था. साथ ही ईमानदारी से उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि यह नाम उनके लिए एक दम नया था. दो या तीन अपवाद थे जिन्होंने फ़ेस बुक पर लीना की दो-चार रचनाएं देखी थीं. यहां चूंकि मैं लीना  कविताओं तक ही अपने आपको सीमित रख रहा हूं ( अन्य कवियों, जिन पर मैंने वहां चर्चा की थी अलग व्याख्यानों में, के बारे मैं अलग से, और जल्दी ही ), लीना की ताज़ा लिखी तीन कविताओं को यहां प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं. तीनों कविताएं इतनी सहज हैं कि मुझे इन पर  किसी अतिरिक्त टिप्पणी अथवा व्याख्या की ज़रूरत नहीं लगती. मुझे विश्वास है कि आपको भी ऐसा ही लगेगा. सहज जीवनानुभव में विचार कितना गुंथ जाता है, कथ्य के साथ एक-मेक हो जाता है, यह देखने-सराहने की चीज़ है. मैं कोई भविष्य वक्ता नहीं हूं, पर मेरा विश्वास है कि आगे के दिनों में जो चार-पांच नाम हिंदी कविता में पूरी प्रखरता के साथ चमकने वाले हैं, उनमें लीना की जगह सुरक्षित है. बाक़ी तीन-चार कवियों के बारे में; ऐसे ही, जल्दी ही.

मेरी यात्रा का ज़रूरी सामान 

आज  मैं एक लम्बी नींद से उठी हूँ
और मुझे ये दिन ही नही ये जिंदगी भी बिलकुल नई लग रही है
मै नही देखना चाहती
सोचना भी नही चाहती कि मैंने अपनी जिंदगी कैसे गुज़ारी है
वह पुरुष कहाँ होगा
जिसे मैंने
हर चाय के प्याले के साथ चोरी चोरी चुस्की भर पिया
और वह पुरुष जो मेरा मालिक था
उसकी परेशानियों और इच्छाओं को समझना मेरा कर्तव्य था जैसे कि मै
कोई रेलगाड़ी की सामान ढोने वाली बोगी थी जिसमे वह
जब चाहे अपनी इच्छाएं और परेशानियाँ जमा कर सकता था
मेरी यात्रा में मै उन्हें उसकी मर्ज़ी के स्टेशन तक ढोती 
जहाँ से उतर कर वह यूँ विदा हो जाता जैसे कोई मुसाफिर चला जाता है.

मैं रात रात भर गिनती रहती मेरी छत से गुजरने वाले हवाई जहाज़ों को
और सोचती उनमे बैठे यात्रियों और उनकी पत्नियों के बारे में
जो शायद घर पर उनकी सलामती कि दुआएं मांग रही होंगी
जबकि उनकी सुखद यात्रा के कई स्पर्श  और चुपके से लिए हुए चुम्बन
 उन जहाजों से  मेरी छत पर गिरते रहते
और रेंगते हुए  मेरे बिस्तर तक जाते
इस तरह मेरी  चादरों पर कढ़े फूलों के रंग फेड हो जाते
तब  माचिस की डिबिया की सारी  दियासिलाइयां सीलन से भर उठती
यही एक मात्र प्रतिरोध था जो मैंने
किया अपने सीमित साधनों से
पर आज मै निकली हूँ घर से
अपनी मर्ज़ी के सब फूल मैंने अपने 
सूटकेस में रख लिए हैं
यही मेरी यात्रा का ज़रूरी सामान है 


एक पगडण्डी  सुख 

मैं  आज एक अनजाने सुख से भरी हूँ
एक नये शहर में मै पहली बार अकेली  गई हूँ 
मै एक ऐसा दिन जीने जा रही हूँ
जिसमे सिर्फ मेरी यात्रा तय है
ये नही की कैसी होगी मेरी यात्रा
और कौन होगा मेरे साथ ?

मै समझ पाई हूँ जीवन को
एक नई दृष्टि से
कि यदि भरे पूरे शहर में तुम्हारा  घर हो 
ही होटल का कमरा 
और कोई दोस्त भी हो आस पास
तो असुरक्षा को
शहर की बिल्लियों से दोस्ती करके
कैसे दूर भगाया जा सकता है
कैसे शहर की गलियां और साईकिल रिक्शा वाला
आत्मीय हो जाता है 
और भरोसे के कितने ही फूल अचानक खिल उठते हैं
और उनकी  सुगंध तुम्हे जीत का एक आश्वासन दे सकती है .  

एक उडती हुई तितली तुम्हारे लिए एक रास्ते  का निर्माण कर सकती है
जिसकी लय पर बेख़ौफ़ बिना पीछे देखे तुम चलते रह सकते हो 

बाग़ में उडती हुई चिड़ियाँ 
दरख्तों पर लटके पत्तो का रिश्ता कितना नायाब होता है 
और कैसे वे  आसमान और मिटटी को एक कटोरी चीनी की तरह उधार लेते  देते हैं..

मैंने जाना 
प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ उपहार आज भी हमें बिना मूल्य चुकाए ही मिलते हैं
और हमारे घर की अलमारियों में बंद सोने चांदी और हरे नोट
सिर्फ डर चिंता और उपभोक्ता ही  पैदा कर सकते हैं 

मैने  अजनबी चेहरों में तलाशा थोडा अपनापन
और जाना कि 
कि  हमारे  भौतिकता से लबरेज़ दिलों में थोड़ी ऊष्मा बाकी है
उनके पसीने से भरे चेहरे और मैले कपडे उनकी गरीबी का नहीं
बल्कि उनके बीच एक अनोखे समाजवाद की घोषणा करते हैं.
और हमें  उनके जैसा होने के लिए सिर्फ धूल और धूप ही चाहिए

बनारस में पिंडदान 

घाट जब मंत्रो की भीनी मदिरा  पीकर बेहोश हो जाते हैं
तब भी जागती रहती हैं घाट की सीढियां 
गंगा खामोश नावों में भर भर के लाती हैं पुरखे 
बनारस की सोंधी सड़कों से गिरते पड़ते आते हैं पगलाए हुए पुत्र

पिंड के आटे में बेटे चुपचाप गूंथ देते हैं अपना अफ़सोस
अंजुरी भर उदासी जल में घोल नहला देते हैं पिता को 
रोली मोली से सज्जित कुपित पिता 
नही कह पाते वो शिकायते 
जो इतनी सरल थी की उन्हें बेटों के अलावा कोई भी समझ सकता था
और इस नासमझी पर बेटे को शहर से निकाल दिया जाना चाहिए था 
किन्तु 
तब  भी  जानते थे  पिता बेटे के निर्वासन से शहर  वीरान हो जायेंगे

भूखे पिता यात्रा पर निकलने से पहले खा लेते हैं 
जौ और काले तिल बेटे के हाथ से 
चूम कर विवश बेटे का हाथ एक बार फिर उतर जाते हैं पिता घाट की सीढियां 

घाट की सीढियां बेटियों सी पढ़  लेती हैं अनकहा इस बार भी 
सघन हो उठती है रहस्यों से  हवाएं   
और बनारस अबूझ पहेली की तरह डटा  रहता है 
डूबता है बहता नही....
शांति में 
घंटियों में
मंत्रो में
शोर में
गंगा में....

- लीना मल्होत्रा