Wednesday, 26 June 2013

यह भी कोई बात हुई !


वह आया और बिना रुके बोलता रहा / चलिए, अभी इसी दम / बस चल पडिए / उठेंगे और चलेंगे नहीं / तो फिर पहुंचेंगे कैसे / कहीं भी.

मैंने पूछा/ कहां?/ उसने फिर कहा / कहीं भी.


कहीं भी में / कोई दिलचस्पी नहीं है अपनी / इतना कहकर मैंने उसका हाथ झटक दिया.


कही भी पहुंचने को तैयार/ होने के लिए/ ज़रूरी है भरपूर मात्रा में/ अवसरवादिता/ मौक़े का फ़ायदा उठाने का कौशल.


अपन को / नहीं पहुंचना कहीं भी / कोशिश करते रहेंगे/ पहुंचने की / जहां पहुंचना चाहिए/ सफल होना / न होना / नहीं है सिर दर्द अपना / तनिक भी.


चल पड़ने की आवाज़ भीतर से आती है / दिशा-संकेत भी मिलते हैं / वहीं से.

-मोहन श्रोत्रिय 

यादों का क्या !


कौन याद कब उभर आए, कहा नहीं जा सकता. आज मैं अपने मित्र-बड़े भाई की किताब के आखि़री प्रूफ़ देख रहा था. करौली से हमारा साथ शुरू हुआ था, सैंतालीस साल पहले. सो अचानक प्राध्यापक के रूप में कॉलेज का अपना पहला दिन याद आ गया. साथ ही और भी बहुत कुछ ऐसा याद आ गया जो करौली जैसे छोटे क़स्बे को खास बना देता है.
इक्कीस बरस की उमर. एमए का परिणाम आने के डेढ़ महीने के भीतर ही मुझे नियुक्ति का तार मिल गया (डाक से पुष्टि बाद में आया करती थी). विश्वविद्यालय से निकला ही था, तो वेश-भूषा भी विद्यार्थियों जैसी ही : आधी बांह की कमीज़, ड्रेन पाइप पैंट, नोकदार चमचमाते काले जूते. प्राचार्य के दफ़्तर की ओर जा रहा था, कि पीछे से एक विद्यार्थी की आवाज़ कानों में पड़ी, "यह भी कोई एडमिशन लेने आ गया दिखता है!" पलटकर देखा तो बोलने वाला एक लंबा-सा स्मार्ट लड़का था. दफ़्तर में औपचारिकताएं पूरी होते ही, प्राचार्य (जो स्वयं भी अंगरेज़ी साहित्य के ही थे) ने पूछा "आज क्लास लेंगे?" मैंने कहा, "क्यों नहीं?" उन्होंने बताया कि आधा घंटा बाद हॉल में विज्ञान के प्रथम वर्ष की अनिवार्य अंगरेज़ी की क्लास होगी. वह मुझे पुस्तकालय ले जा रहे थे, तभी लड़कों का वही झुंड दिख गया, और वह लड़का भी. शायद वह समझ गया कि मैं एडमिशन लेने तो नहीं आया था. पुस्तकालय में, मैंने नोट किया, कि प्राचार्य मेरी रुचियों का अंदाज़ लगाने की कोशिश कर रहे हैं. जिस शेल्फ़ के सामने मैं रुकता वह भी रुक जाते. थोड़ी देर बाद ही घंटी बज गई, और वह मुझे हॉल के दरवाज़े पर आगे बढ़ लिए (बाद में पता चला कि वह आस-पास ही मंडरा रहे थे, आश्वस्त हो जाने के लिए कि मुझे कोई परेशानी का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है. ग़नीमत थी कि नहीं पड़ा. और वह बाद में चाय पीते-पीते अपनी खुशी व्यक्त कर भी गए कि मेरा पहला दिन उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा शानदार रहा.
हॉल में घुसा, और सभी छात्र खड़े हो गए. वह लड़का भी जिसे मैं यहां "पढ़ने आया अपने जैसा लड़का" लगा था. मेरी नज़र उसी पर थी. मैं मुस्कराया, और उसने नज़रें नीचे कर लीं. कहा कि सबके नाम कल लिखेंगे, और एक-एक से परिचय भी कल ही करेंगे. आज तो अपना परिचय दे देते हैं. और चूंकि शिक्षक का परिचय पढ़ाने से मिलता है, तो पढ़ाकर देना ही ठीक रहेगा. किताब मिली नहीं थी. व्याकरण से ही एक टॉपिक चुना, और शुरू हो गए. इतनी देर में यह समझ में तो आ गया था कि बोर्ड पर लिखने के लिए जब विद्यार्थियों की तरफ़ पीठ करूंगा तो कोई शोर तो शुरू नहीं ही होगा. एक वाक्य लिखता और तुरत उसका खुलासा करने के लिए मुड़ जाता. उस स्मार्ट लड़के की ओर ज़रूर देख लेता.
पहले बीस मिनट निर्विघ्न निकल जाएं तो फिर क्या डर? तो सच में कोई डर नहीं था.
वह स्मार्ट लड़का हिंडौन में नामी-गिरामी वकीलों में गिना जाता है. जब भी यहां मुझसे मिलने आता है तो पहले दिन के अपने जुमले का ज़िक्र किए बिना नहीं रहता. साथ ही यह भी जोड़ना नहीं भूलता "मेरी समझ में यह क्यों नहीं आया कि आप पढ़ने नहीं, पढ़ाने आए थे?"

-मोहन श्रोत्रिय 

संस्‍मरण

1970 में, करौली में एक नौजवान ग़ज़ल गायक फ़ारूक़ ने एक बेहद शानदार ग़ज़ल सुनाई थी. फ़ारूक़ उस कच्ची उमर में ही बहुत लोकप्रिय हो गए थे, और देश भर में उनकी मांग रहती थी, ग़ज़ल- संध्याओं में. बाद में अंगरेज़ी विभाग के ही मेरे एक सहकर्मी भी इसे उसी बलंदी के साथ सुनाते थे. वह अब नहीं रहे. आज अचानक उनकी याद आ गई, बेवजह-सी. इस ग़ज़ल के सिर्फ़ दो अशआर याद रह गए हैं.
न इतना तेज़ चले सिरफिरी हवा से कहो
शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है.
ये किस मुक़ाम पे ले आया है जुनूं मुझको
जहां से अर्श भी नीचा दिखाई देता है.
 

ठोस ज़मीन पर खड़ा शायर ही यह बात कह सकता है.
आज के हालात के हिसाब से भी ये अशआर एकदम मौजूं लगते हैं. आइपीएल या फ़ेसबुक के संदर्भ में इनकी प्रासंगिकता तलाशने की ज़हमत न उठाएं.
 

-मोहन श्रोत्रिय

बुद्ध ने कहा, आनंद से

बुद्ध से आनंद ने पूछा था कि आप इस निरंतर गाली दे रहे व्यक्ति की बातों पर मुस्करा क्यों रहे हैं, और जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? इस पर भी बुद्ध ने फिर मुस्कराकर कहा, जिसके पास जो होगा वही तो देगा. अब यह तुम पर है कि उसे स्वीकार करो/न करो. कोई तुम्हें धन देना चाहता है, और तुम लेने से इन्कार कर दो, तो वह धन कहां रहेगा? देने की कोशिश करने वाले के पास ही न? तो इसी तरह मैं इसकी गालियों को नहीं ले रहा हूं, तो ये भी इसी के पास लौटकर चली जाएंगी न? मैं इसीलिए मुस्करा रहा हूं, और मेरी मुस्कान के साथ इसका क्रोध बढता जा रहा है. खीझ भी. क्रोध और खीझ आत्मघाती होते हैं क्योंकि ये इसके तनाव और अवसाद को बढाएंगे.
तो मित्रो, पिछले पांच-सात दिनों में मुझे जो गालीनुमा ख़िताब ("शोहदों" और "पंडों" का "गॉड फ़ादर", "फ़ेसबुक-बाबा", "बाबा फेलूनाथ") एक विद्वान सदाशयी संपादक और पिछले दिनों बहु-सम्मानित साहित्यकार ने दिए हैं, उन्हें मैं आनंद की मार्फ़त मिली सीख के अनुरूप, मुस्कराकर लौटा रहा हूं. कहने की ज़रूरत है क्या कि अब ये ख़िताब किसके खज़ाने की शोभा बढ़ाएंगे !
वैसे भी जो मुझे जानते हैं (उनकी संख्या कितनी ही कम क्यों न हो?), उनकी मेरे बारे में राय इन खिताबों से बदलेगी नहीं, और जो नहीं जानते या नहीं जानना चाहते हैं उनकी राय की फ़िक्र में मुझे दुबला क्यों होना चाहिए? एक सज्जन तो मेरी अंत्येष्टि की कामना करते हुए भी देखे गए. हमारे ब्रज में एक कहावत प्रचलित है कि "कव्वों के कोसने से ढोर मरने लगते तो एक भी ढोर नहीं बचता!" अब वह (अंत्येष्टि की कामना करने वाले भद्र समीक्षक) इस कहावत को अभिधा में लेकर मुझे "ढोर" कहने लगें तो यह उनकी समझ! पर इसमें एक जोखिम भी निहित है, क्योंकि वैसा करने का मतलब होगा कि वह अपने आपको "कव्वों" से जोड़ रहे हैं.


-मोहन श्रोत्रिय 

और दो संस्‍मरण

चमत्कार

1970 के साल की बात है. बेटी (दीप्ति, जिसे हम घर पर रिज्जी कहते हैं) के जन्म के बाद की पहली दिवाली की. जिस दिवाली को हम ठाठ से मनाना चाहते थे, पर मना नहीं पाए. दिवाली की पूर्व-संध्या यकायक चिंता और व्यग्रता का सबब बन गई. हम (मैं, और भाईसाब यानि भारद्वाज जी, जिनकी जल्दी ही छपने वाली किताब का ज़िक्र किया था मैंने, अभी तीन दिन पहले) घर लौटे, तो देखा कि रिज्जी बेहाल है. खांसी ऐसी कि रुक कर ही न दे, सांस लेने में मुश्किल, और चेहरा इतना लाल कि जैसे खून ही टपकने वाला हो. न तो ऐसी खांसी देखी थी पहले, और न उसकी वजह से सांस लेने में ऐसी परेशानी ! भाईसाब ने उसे गोद में लिया, और बोले : “चलो, अस्पताल चलो.” अस्पताल घर से ज़्यादा दूर नहीं था. जैसे ही अस्पताल के दरवाज़े पर पहुंचे, तो देखा कि सामने खड़ी एक ठसाठस भरी बस में डॉ. शत्रुघ्न अग्रवाल चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. मैंने उन्हें ज़ोर से, लगभग चीखते हुए आवाज़ दी, और वह बस से उतर गए. वह क़स्बे के इस ज़िला अस्पताल में सबसे कुशल चिकित्सक थे. उन्हें समस्या बताई तो वह रिज्जी का चेहरा देखते ही, कुछ घबराए से लगे. हमें लगभग खींचते हुए अस्पताल में ले गए. एक बड़ी टॉर्च मंगवाई, और रिज्जी के गले के भीतर तक का नज़ारा देखा. तुरत स्टोर-कीपर को बुलाया (जो संयोग से अभी तक वहां था) और उसे एंटी-डिफ्थीरिया-सीरम लाने को कहा. जब तक इंजेक्शन आए और लगे, उन्होंने कहा कि पांच मिनट की भी देर हो जाती तो बात बिगड़ जाती, आने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, और यदि हम आ भी गए होते तो भी कोई मदद नहीं मिल पाती, क्योंकि दिवाली की छुट्टियों में सिर्फ़ डॉ. गौड़ (हड्डी के डॉक्टर) ही यहां उपलब्ध होते, जो हाथ खड़े कर देते. इंजेक्शन लगाने के बाद उन्होंने रिज्जी को क्वेरंटाइन वार्ड में भर्ती कर लिया. यह कोई व्यवस्थित वार्ड नहीं था. एक अलग-थलग बरामदे में एक पलंग डाला हुआ था. उजाले और हवा से महरूम. स्टोर-कीपर ने आकर बताया कि उसके पास दो इंजेक्शन और रखे हैं, आपातकालीन उपयोग के लिए. अगले दिन तक हमें इनकी एवज़ में तीन इंजेक्शन जमा कराने होंगे. आज लोगों को यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि क़स्बे के सबसे बड़े कैमिस्ट के पास भी ये इसलिए उपलब्ध नहीं होते थे कि उसके पास फ़्रिज नहीं था. हमने ‘हां’ कह दिया, क्योंकि हमें भरोसा था कि भरतपुर में मेरा बचपन का मित्र रमेश सूचना मिलते ही वह इंजेक्शन लेकर (बर्फ़-भरे डिब्बे में रखकर) अगली रात, यानि दिवाली की रात तक आ जाएगा. ऐसा ही हुआ भी, और उसकी दिवाली भी हमारी तरह अस्पताल में ही बीती (मनी तो क्या कहूं?). डॉ. अग्रवाल ने छुट्टियों में प्रभारी रहने वाले डॉ. गौड़ को बुलाकर सारा केस समझा दिया. ये डॉ. गौड़ भी हमारे अच्छे मित्र थे, और अक्सर सायंकालीन भ्रमण में साथ रहा करते थे. इसके बाद डॉ. अग्रवाल किसी ट्रक में बैठकर गंगापुर के लिए रवाना हुए, हमें पूरी तरह आश्वस्त करते हुए कि वह रात ठीक से गुज़र जाने का मतलब होगा कि बेटी ने घाटी पार कर ली है. रात का गुज़रना बाक़ी था, पूरी आश्वस्ति केलिए. रात गुज़र गई, पर हमारा मन अभी भी पूरी तरह चिंता-मुक्त नहीं था.
अगले दिन दो और इंजेक्शन लग गए, और मेरा मित्र चूंकि इंजेक्शन ले आया था, तीन अतिरिक्त भी ताकि हमारे काम न आएं तो अस्पताल में औरों के काम आएं. इन अतिरिक्त इंजेक्शनों की ज़रूरत नहीं पड़ी, या शायद एक की पड़ी हो तो पड़ी हो. तीसरे दिन सुबह जब डॉक्टर ने रिज्जी के गले में झांका, तो उनका चेहरा खिल गया. उन्होंने बताया कि जीभ से लेकर गले के भीतर तक पसरी-फैली वह सफ़ेद झिल्ली पूरी तरह गायब हो चुकी थी, जिसे देखकर ही डॉ. अग्रवाल के चेहरे पर बनी चिंता की लकीरें हमने देखी थीं,
तबसे लेकर अब तक न जाने कितनी बार यह खयाल मन में आया है, आता रहा है, कि बच जाने और न बच पाने के बीच कोई बेहद महीन धागा ही होता है, लगभग अदृश्य सा. दो मिनट की भी देर हो जाती, और डॉ. अग्रवाल की बस रवाना हो जाती तो क्या होता? बहुत कल्पनाशील होने की ज़रूरत नहीं है इसका उत्तर देने में सक्षम होने के लिए. एक ऐसा उत्तर जिसे देने में डर लगता है, और मन नहीं मानता है कि वह उत्तर दिया जाए. भीतर से एक ही आवाज़ आती है कि चमत्कारों ने घटित होना बंद नहीं कर दिया है.
और जैसा संत ऑगस्टीन ने कहा था : “चमत्कार प्रकृति के प्रत्याख्यान के रूप में घटित नहीं होते, अपितु प्रकृति संबंधी हमारे ज्ञान के प्रत्याख्यान के रूप में घटित होते हैं.”
                                                  ***

दुनिया की नज़र में वे छोटे लोग थे, पर दिल के बहुत बड़े थे. और हमारे लिए सगों से भी ज़्यादा सगे

आज एक बार फिर करौली !
हम जिस मकान में रहते थे, वह उस ज़माने के हिसाब से अच्छे बने मकानों में था. साफ़-सुथरा, हवादार ! तीन परिवार रहते थे. मकान-मालिक बंबई में रहते थे.
उन्होंने एक कमरा एक दंपति को दे रखा था, घर की निगरानी के लिए. वहां रहने वाले हम सभी के छोटे-मोटे काम वे दोनों बड़े उत्साह से करते रहते थे. वह दंपति निस्संतान था, पर पति-पत्नी दोनों के सीने में बच्चों के प्रति प्यार के पाताल-तोड़ कुएं थे, या कहिए प्यार के झरने बहते रहते थे. हम से उम्र में दोनों बड़े थे, पर हम उन दोनों को ही नाम से ही बुलाते थे - गोपीजी और अतरबाई. गोपीजी की दुकान थी, उसे हेयर कटिंग सेलून तो कहा नहीं जा सकता. पर हां, वह बाल काटने का काम करते थे.
जब मेरी बेटी(मेरी एक मात्र संतान) पैदा हुई, तो उन्हें तो जैसे एक खिलौना ही मिल गया. अधिकांश समय दीप्ति या तो अतर बाई की गोद में होती थी, या फिर सुबह-शाम गोपीजी उसे कंधे पर लिए फिरते थे. बाज़ार तक का चक्कर लगवा लाते थे. दो बरस तक यह सिलसिला यों ही चलता रहा. हम कुल मिलाकर वहां छह साल रहे, पर दीप्ति जब दो साल की होगई थी, तो हमारा वहां से तबादला हो गया. कहने की ज़रूरत नहीं कि जब हम वहां से चलने वाले थे तो कई दिन पहले से गोपीजी और अतर बाई दीप्ति को एक मिनट के लिए भी अपने से अलग करने से बेहद दुखी हो जाते थे. उनकी रात कैसी बीतती होगी यह बात हमें परेशान करती थी.
वहां से चले आने के बाद भी कई बार करौली जाना हुआ था. ठहरते कहीं भी हों, पर सबसे पहले अपने उस पुराने "घर" जाकर गोपीजी-अतर बाई से मिलना हमारा पहला काम होता था. 1980 में आखिरी बार उनसे मिलना हुआ. पर जब 1995 में दीप्ति की शादी होने वाली थी तो मुझे लगा कि मुझे करौली जाकर ही उन्हें न्योता देना चाहिए. आप अंदाज़ नहीं लगा सकते कि उन्हें कितनी खुशी हुई होगी. अपनी तमाम शारीरिक परेशानियों और आर्थिक कष्टों के बावजूद वे दोनों जयपुर आए. पहली दफ़ा शहर में आए थे, और मान सरोवर पहुंचकर ऐसे भटके कि बीच सड़क पर बैठकर मदद के लिए गुहार लगाने लगे. ग़नीमत रही कि एक ऐसे नौजवान की नज़र उन पर पड़ गई, जो उस दृश्य को अनदेखा नहीं कर पाया, खुद बड़ा भावुक होने के कारण. उसने निमंत्रण पत्र पर पता देखकर उन्हें आश्वस्त किया कि वे मेरे घर के बहुत पास हैं. उन्हें वहीं बैठा छोड़कर, वह मेरे घर आया. मैं उसके साथ जाकर उन्हें अपने घर लेकर आया. मुझे देखते ही वे जैसे बिलखे, और दोनों एक साथ मेरे गले लगे, मेरी आंखों में भी आंसू आ गए. चार दिन तक वे अपने तमाम कष्टों को भूले रहे, और फुदके-फुदके फिरते रहे. हमारी नज़र में ही नहीं, अन्य घनिष्ठ मित्रों की नज़र में भी वे शादी में हमारे सबसे खास मेहमान बने रहे. दोनों का कहना यह था कि उनके जीवन की "साध" पूरी हो गई कि वे दीप्ति की शादी में शामिल होने के लिए ज़िंदा रहे.


आज वे नहीं हैं, दोनों ही. पर हमारे जीते-जी वे हमारे साथ रहेंगे. जाति-बिरादरी और खून के रिश्तों से कहीं बड़ा था उनका रिश्ता, हमारे साथ.


-मोहन श्रोत्रिय 

दो संस्‍मरण


धरा क्या है, नाम में?

कॉलेज में पढ़ाते सात-आठ दिन बीते होंगे कि एक दिन सुबह-सुबह ही धुआंधार बरसात शुरू हो गई. सिर्फ़ एक क्लास हो पाई थी. आगे की कोई संभावना नहीं थी क्योंकि वहां एक अलिखित परिपाटी चली आ रही थी कि आठ बजे तक तेज़ बरसात शुरू हो जाए तो कालेज आने की ज़रूरत नहीं. इसका असल कारण यह था कि वज़ीरपुर दरवाज़े से निकलते ही एक ढलान शुरू हो जाता था, जो चारसौ - पांच सौ गज के बाद चढाई में तब्दील हो जाता था. वहां से क़रीब दो सौ गज चलने के बाद कॉलेज का मुख्य द्वार आता था. तो एक तरफ़ से, शहर का, और दूसरी तरफ़ से कॉलेज वाली सड़क का पानी उस ढलान वाले इलाक़े को सराबोर कर देता था, सरोवर में तब्दील कर देता था. कई दफ़ा तो आदमी-डुबान पानी हिलोरें मारता रहता था वहां.
तो इसके बाद क्लास ही नहीं होनी थीं, इसका मतलब छुट्टी थोड़े ही था, हमारे लिए. छुट्टी कर भी दी जाती, तो घर कैसे पहुंचते ! स्टाफ़रूम का सहायक भी नहीं आया था, इसलिए चाय भी नहीं मिल सकती थी. दूध भी तो वह ही लेकर आता था.
दो मित्रों ने कहा चलो, बाहर चाय पी आते हैं. छाते तो वहां सबके पास होते ही थे (मैंने भी खरीद लिया था, वहां पहुंचने के अगले ही दिन), कॉलेज के सामने से, बाईं ओर से जो सड़क निकलती थी (गंगापुर-कैलादेवी की तरफ़), उस पर एक थडी थी, (जो क़ायदे से थी तो कॉलेज परिसर में ही), वहां चाय के साथ पकोड़े सुबह से शाम तक कभी भी मिल सकते थे.
थडी के मालिक के बारे में इतना तो पता चल ही चुका था कि वह लोक-गायक हैं, और आशु कवि भी हैं. ज़ाहिर है, उनसे मिलने की मेरी इच्छा भी अब तक बलवती हो चुकी थी. मैंने हां ही नहीं कर दी, बल्कि मैं तो आगे बढ़ भी लिया. वहां पहुंचने के लिए हमें कॉलेज परिसर से बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि केमिस्ट्री-लैब में होकर भी वहां तक जा सकते थे.
वहां पहुंचकर देखा कि कि एक पांच-फ़ुट से कम लंबाई वाला व्यक्ति सफ़ेद बुर्राक कुरता-धोती पहने बैठा हुआ है, और एक सहायक चाय बना रहा है. दूसरी सिगड़ी पर कड़ाही में तेल औंट रहा था. मेरे वरिष्ठ मित्र ने मेरा परिचय कराया उनसे. वह खुश हुए. उनकी लंबाई ही कम थी, चौड़ाई तो ठीक से अधिक ही थी. यानि उनका "मध्य प्रदेश" काफ़ी फैलाव लिए हुए था. उनका नाम बताया गया, "टुच्चे गुरु". मैं चौंका, पर शायद वह खुद मेरे आश्चर्य के भाव को भांप गए थे, तो हंसकर बोले मेरा यही नाम है. दो-चार मिनट तक औपचारिक बात-चीत चलती रही. इसके बाद, मेरे वरिष्ठ मित्र की फ़रमाइश पर उन्होंने अपना खुद का लिखा हुआ एक बेहद लोकप्रिय पद सुनाया :
"मेरे श्याम के नैन बने हैं फूल कमल के
लहर-लहर लहराएं हिलोरे जमुना-जल के".
मैं आज भी उनकी गायन-मुद्रा को देख सकता हूं, आंख बंद करके, और मुझे कोई संकोच नहीं यह कहने में कि मैंने ऐसी शानदार प्रस्तुति जीवन में अन्यत्र कहीं नहीं देखी. अंग-अंग थिरक रहा था, और गाने के सौंदर्य में न जाने कितने चांद-सूरज जड़ रहा था.
वहां एक लोक विधा प्रचलित है - आशु कविताई और गायन की. यह स्पर्धा के रूप में आयोजित होती है. कई टीमें भाग लेती हैं. इसे किलगी-तुर्रा कहा जाता है. और जब यह प्रतियोगिता होती है, तो सुनने के लिए जैसे पूरा क़स्बा उमड़ आता है. रात भर चलता है यह कार्यक्रम. और अपने, चाय-पकोड़े वाले ये "टुच्चे गुरु" इस कार्यक्रम की जान होते थे, साल-दर-साल. असल नायक ! और उस दिन जैसे उनका क़द काफ़ी बढ़ जाता था. क़स्बे में उन्हें जो सम्मान हासिल था, वह बड़े-बड़ों की ईर्ष्या का सबब था.
मेरे पिताजी जब करौली आते (ठहरते चूंकि एक ही रात थे), तो हमारे घर एक संगीत का कार्यक्रम होता था, हर बार, बिना किसी अपवाद के. मेरे पिता तबला शानदार बजाते थे, और ग़ज़लें भी उतने ही जानदार ढंग से सुनाते थे. क़स्बे के लगभग सभी कलाकार इसमें शामिल होते थे, तथा मेरे मित्र भी, जो बेसब्री से इस आयोजन का इंतज़ार करते थे. टुच्चे गुरु इस कार्यक्रम की भी "जान" हुआ करते थे. वह मेरे पिता के समवयस्क होने के बावजूद उनके घुटनों तक झुककर अपना सम्मान प्रकट करते थे (इससे ज़्यादा तो वह झुक भी नहीं सकते थे, चाहकर भी), पर उनकी प्रस्तुति के बाद मेरे पिता उन्हें गले लगा लिया करते थे.
कार्यक्रम के दो-तीन महीने बाद ही, जब भी टुच्चे गुरु से बात होती, वह छूटते ही कहते, "बुलवा लो न साब, अपने पिताजी को. बहुत दिन हो गए अब तो !"
वह व्यक्ति, वह कला-साधक-महानायक अब नहीं है, पर मेरी याददाश्त के एक कोने में तो अभी भी हैं, वह अपनी पूरी धज के साथ. और जब तक मैं हूं, उनकी जगह बनी रहेगी.

                                            ***

कल पिता की बरसी थी. सोलहवीं.

कल दिन भर उनका गायक का रूप दिल-ओ-दिमाग़ पर हावी रहा. सतत्तर बरस की उम्र तक तबले पर थिरकती उनकी उंगलियां दिखती रहीं, मन की आंखों से. ब्रज के लोकगीत और रसिया गूंजते रहे. पचास के दशक में आकाशवाणी पर वह यह सब सुनाते थे. फिर स्वाद बदलने को, 'जाग दर्दे इश्क़ जाग, दिल को बेक़रार कर...' और ' मैं कोई पत्थर नहीं इंसान हूं. कैसे कह दूं, ग़म से घबराता नहीं...कोई साग़र दिल को बहलाता नहीं' सुनते थे, यह सब कानों में गूंजता रहा.
उनके बहाने नौटंकी सम्राट गिर्राज जी की भी याद ताज़ा हो आई. वह पिता के घनिष्ठतम मित्रों में से थे. अब तो वह भी नहीं रहे. उनके निधन तक जब भी मैं कामां जाता था, तो उनके साथ तीन-चार घंटे की बैठक होती ही थी, निरपवाद रूप से. कम लोगों को पता है कि पचास के दशक में नौटंकी मंडली "मनोहर-गिर्राज" की मंडली के रूप में जानी जाती थी. मनोहर जी बहुत जल्दी चले गए. उन्हें गिर्राज जी से भी अधिक प्रतिभाशाली माना जाता था. खुशी की बात आखिरकार यही रही कि गिर्राज जी को उनकी कला के लिए तमाम सम्मानों से नवाज़ा गया. उनसे जब भी बात होती थी तो वह मनोहर जी और मेरे पिता का स्मरण श्रद्धापूर्वक करते थे, और मिलने पर मुझे बांहों में भरकर 'कुंवर साब' कहते, और इस तरह अपना ममत्व लुटाते.
वृन्दावन में, जहां पिता ने तीस बरस बिताए, आज भी वहां के लोग उनके 'समाज-गायन' की न केवल प्रशंसा करते हैं, इस बात पर दुख भी जताते हैं कि जब से वह गए हैं, वृन्दावन का 'समाज-गायन' वैसा नहीं रहा. न तो कला की दृष्टि से, और न निष्ठा की दृष्टि से !

-मोहन श्रोत्रिय 

Monday, 24 June 2013

मक़बूल फ़िदा हुसेन : मैं गु़स्सा था तुमसे


तुम्हारे बाहर जा बसने से 
मैं गु़स्सा था हुसेन 
बेहद  बेइंतिहा. यूं गु़स्सा तो 
था मैं सियासतदानों से भी 
और इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के
वज़ीरों और हुक्‍़मरानों और 
मुल्क़ की सबसे बड़ी कचहरी से भी.

मज़हबी जुनूनियों और लम्पट तबकों को
तो "हर दिन होली और रात दिवाली" का 
तोहफ़ा दे दिया तुमने अनजाने ही 
अपने बाहर जा बसने के फै़सले से
और बसने के लिए चुना भी
तो एक इस्लामी देश.
करेला और नीम चढ़ा. 
तुम्हें क्यों ख़याल तक 
नहीं आया अपने 
करोड़ों मुरीदों का ?
कि तुम निराश करोगे उन्हें 
अपने इस क़दम से 
इस फै़सले से...

मैंने पहली बार जब नाम
पढ़ा था तुम्हारा  और जाना था 
तुम्हे एक बेहद मशहूर
चित्रकार के रूप में 
तो शब्दकोश में खोजे थे 
मायने "मक़बूल" के.
जितने भी अर्थ मिले मक़बूल के
वे सब के सब आयद होते थे तुम पर
"हर दिल अज़ीज़"
"स्वीकृत-सम्मानित" और 
"वाक् सिद्ध".

क्यों नहीं था तुम्हें खु़द को 
यक़ीन   कि बेमानी नहीं थे
ये मायने तुम्हारे
नाम के?
तुम्हारे प्रशंसकों की तादाद इतनी भी 
कम न थी कि  डिग जाना सही हो 
तुम्हारे आत्मविश्वास का.
टिकना था  टिके रहना था 
तुम्हें रहना था अडिग अविचल 
जो तुम नहीं रहे   यही नहीं 
तुम अपने फै़सले को सही ठहराने 
में जुट गए
और तुम्हें यहां से धकियाने वालों को 
मिल गया एक हथियार 
तुम्हारे खिलाफ़  जिसने 
बना दिया और अधिक लाचार 
तुम्हारे अपने ही 
समर्थकों को जो हर सूरत में 
चाहते थे तुम्हारी वापसी 
ससम्मान वापसी 
उस धरती पर 
जहां तुम चलते थे नंगे पैर 
मुक्तिबोध की शवयात्रा में शामिल
होने के दिन से ही.
यह पैंतालीस 
साल का वक्‍़फा इतना कम भी 
तो न था कैसे चले होगे तुम
अजनबी मुल्क़ की धरती पर?

कैसे समझ सकते थे तुम्हारे काम की 
क़ीमत और अहमियत 
वे लोग जिन्हें कोई सलीका 
न था कला के मूल्यांकन का,
जो प्रशिक्षित हैं बचपन से और 
अभ्यस्त भी देखने के 
हर चीज़ को मज़हब के दकियानूसी 
चश्मे से?
तुम्हें क्यों नहीं लगा कि 
तुम कर रहे थे कमज़ोर 
अपने ही लोगों को जो
लगातार बेनक़ाब करने में लगे थे
खजुराहो और कोणार्क की विरासत 
पर फ़ख्र करने वालों के दोग़लेपन को.

मक़बूल तुम कैसे 
ज़िंदा रह सकते थे परायी धरती पर
ज़फ़र के दर्द से तुम इतने नावाकिफ़
थे क्या?
परायी धरती में दफ़नाए गए तुम
ज़फ़र ही की तरह
बेहद तकलीफ़ है मुझे इससे.
बहुतेरे औरों को भी यह नाग़वार गुज़रा है. 

सियासतदानों को कोई  ख़ास फ़र्क़ 
नहीं पड़ता इससे 
पर जो यकीन करते हैं इस मुल्क़ की 
गंगा-जमुनी तहज़ीब की 
तहरीक में जी-जान से,
वे सब तो शर्मसार हैं. पर यह तो 
मानोगे तुम भी 
मक़बूल फ़िदा हुसेन कि
तुम भी विचलित हो गए 
और चूक गए इस तहरीक में अपना 
यक़ीन ज़ाहिर करने से.

मक़बूल तुम और मक़बूल 
होते-होते रह गए. चित्रकार तो 
बड़े थे ही तुम 
रह गए  कुछ और बड़ा इंसान 
बनते-बनते.  एक हद से ऊपर उठ पाना 
संभव भी नहीं होता शायद. खै़र...... 


- मोहन श्रोत्रिय